कविता को
सिर्फ़ शब्द मत समझो,
उसकी असली बनावट
विराम चिह्नों से होती है।
अल्पविराम
एक हल्की-सी सीढ़ी है,
जहाँ साँस रुकती नहीं,
बस ठहरती है।
पूर्णविराम,
एक बंद कमरा नहीं,
बल्कि अगली मंज़िल की
चुप सीढ़ी।
प्रश्नवाचक चिन्ह
ऊपर उठती हुई पगडंडी है,
जो उत्तर से पहले
आकाश दिखा देती है।
और विस्मयादिबोधक,
जैसे अचानक खुली खिड़की,
जहाँ से हवा
बिना सूचना भीतर आ जाए।
पाठक अक्सर
शब्दों में भटकते हैं,
पर जो विरामों को पढ़ ले,
वह कविता की
गुप्त सीढ़ियाँ पा लेता है।
वहीं से
नीचे उतरकर
अपने भीतर पहुँचना आसान होता है
जहाँ कोई शोर नहीं,
सिर्फ़ अर्थ की धीमी आहट है।
कविता दरअसल
लिखी कम,
ठहरी ज़्यादा जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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