कविता में
कई चोर दरवाज़े होते हैं,
मुख्य द्वार से आप
अर्थ लेकर भीतर आते हैं,
पर असली घर
किसी कोने में छुपा रहता है।
एक दरवाज़ा
शब्दों के पीछे खुलता है,
जहाँ अर्थ नहीं,
सिर्फ़ आहट रहती है।
दूसरा
विराम चिह्नों के बीच,
जहाँ अल्पविराम
साँस बन जाता है,
और पूर्णविराम
एक लंबी चुप्पी।
कुछ दरवाज़े
स्मृतियों की दीवार में जड़े होते हैं,
उन्हें वही देख पाता है
जिसने कभी वैसी ही
धूप, वैसी ही उदासी
या वैसा ही प्रेम जिया हो।
कवि तो बस
मुख्य रास्ता दिखाता है,
पर पाठक
अक्सर किसी गुप्त मोड़ से
अपने ही भीतर उतर जाता है।
और सबसे रहस्यमय दरवाज़ा,
वह है
जो कविता पढ़ते-पढ़ते
अचानक खुलता है,
और आप समझते हैं
कि यह पंक्तियाँ
आपके बारे में लिखी गई थीं।
कविता में
कई चोर दरवाज़े होते हैं,
कोई बाहर निकलने के लिए,
कोई भीतर जाने के लिए।
जो भीतर चला जाए,
वही सचमुच
कविता तक पहुँचता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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