एक सुलगी हुई रात और वो
(एक पुरुष की आत्मस्वीकृति – मोनोलॉग कथा)
रात तीन बजने वाले थे...
कमरे की बत्ती नहीं जली थी, सिर्फ़ खिड़की से आता चाँद था
जो टुकड़ों में बिखरा पड़ा था फ़र्श पर।
मेरे हाथ में एक जली हुई सिगरेट थी... और दिमाग़ में वो —
वो लड़की,
जो अब मेरी नहीं थी, शायद कभी थी भी नहीं,
पर उसका होना… ऐसा था जैसे धुएँ की खुशबू
जो दिखती नहीं, मगर हर जगह होती है।
उस रात, सब कुछ वैसा ही था
जैसा अक्सर होता है
जब कोई किसी को भुलाने की कोशिश करता है…
पर यादें खुद जलने को आमादा होती हैं।
मैंने रेडियो चलाया था
पुराना ग़ज़ल चैनल, जिसमें कोई कह रहा था
"तेरे जाने का ग़म, और न आने का ग़म..."
मुस्कुरा दिया था मैं —
कभी ये ग़ज़ल मज़ाक लगती थी,
अब ये मेरी आत्मकथा थी।
कमरे में वही पुरानी खामोशी थी,
जिसे वो कभी अपने हँसते लहजे से तोड़ देती थी।
अब उसी खामोशी में
हर चीज़ सवाल बनकर गूंजती थी:
"क्या वो कभी लौटेगी?"
"क्या जो था वो वाक़ई 'मोहब्बत' था, या बस एक लम्हे का भ्रम?"
"या शायद मैं ही वक़्त के गलत कोने पर खड़ा था?"
मुझे याद है,
एक बार उसने कहा था
"तुम्हारे साथ रहना, जैसे धुआं पीना है...
लत भी, नुकसान भी… और आदत भी!"
मैं हँसा था उस वक़्त...
अब समझ आया, वो अपनी छूटने की वजह बता रही थी।
उस रात जब वो गई थी,
दरवाज़ा धीरे से नहीं,
अंदर तक चुभने वाले सन्नाटे के साथ बंद हुआ था।
मगर असल विदाई उसके जाने के हफ्तों बाद हुई —
जब मैंने महसूस किया कि कमरे में अब उसकी खुशबू भी नहीं बची,
तकिए पर उसके बाल भी नहीं,
और बातों में उसकी टोक भी नहीं।
रातें वैसे ही जलती रहीं...
जैसे मेरी सिगरेटें, जैसे मेरी नींदें।
मैं जीता रहा,
जैसे कोई जला हुआ मकान खड़ा रहता है
भीतर से राख, बाहर से ईंटों का भ्रम।
और आज...
इतने सालों बाद भी, जब रात सुलगती है,
तो उसकी परछाईं लौट आती है,
बैठ जाती है मेरे सामने...
खामोश...
और मैं फिर से वही सवाल पूछ बैठता हूँ
"क्या तुम कभी सच में मेरी थीं?"
मुकेश इलाहाबादी
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