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Wednesday, 18 February 2026

गुलमोहर का पेड़ और वो साँवली-सी लड़की

गुलमोहर का पेड़

हर साल की तरह इस बार भी दहका है

लाल फूलों में जैसे

किसी चुप प्रेम का उजाला ठहरा हो।


और उसके नीचे

वो साँवली-सी लड़की

धूप और छाँव के दरमियान खड़ी,

जैसे शाम का पहला रंग

धरती पर उतर आया हो।


उसके चेहरे पर

कोई बनावट नहीं थी,

बस एक सादगी

जो गुलमोहर की पत्तियों से छनती

रोशनी में और गहरी लगती थी।


जब हवा चलती,

फूल उसके बालों में उलझ जाते,

और वह मुस्कुरा कर

उन्हें हटाती नहीं

जैसे उसे पता हो

कि कुछ रंग

सजावट नहीं, पहचान होते हैं।


गुलमोहर की छाँव

पूरा साया नहीं देती,

बस हल्की-सी ठंडक;

ठीक वैसे ही

उसकी मौजूदगी,

न पूरी दूरी,

न पूरी नज़दीकी।


वो ज़्यादा बोलती नहीं थी,

पर उसकी आँखों में

कई मौसम ठहरे रहते,

बरसात की भीनी गंध,

सर्दियों की शांत धूप,

और किसी अनकहे सवाल की तपिश।


पेड़ हर झोंके पर

थोड़ा-सा झुकता,

जैसे उसे पहचानता हो;

और हर झरे फूल के साथ

ज़मीन पर

एक लाल दास्तान लिखी जाती।


मैं दूर खड़ा देखता रहा,

वो लड़की,

गुलमोहर की आग-सी छाँव में,

ख़ुद एक मौसम लगती थी—

साँवली, मगर उजली;

ख़ामोश, मगर गहरी।


शाम ढलते-ढलते

उसकी परछाईं लंबी हो गई,

और पेड़ के फूल

और भी दहक उठे,

जैसे दोनों के बीच

कोई बिन-बोला समझौता हो।


वो चली गई,

धीरे-धीरे,

धूप की आख़िरी लकीर की तरह;

पर गुलमोहर अब भी खड़ा है,

हर साल उसी तरह खिलता हुआ,

मानो इंतज़ार में हो

कि वो साँवली-सी लड़की

फिर से उसकी छाँव में आ खड़ी हो।


और मैं

हर बार उस पेड़ के पास से गुजरते हुए

सोचता हूँ,

कुछ लोग

पेड़ों की तरह नहीं जाते,

वे ऋतु बन जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,

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