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Thursday, 19 February 2026

तुम्हारे हाथ की खिचड़ी का स्वाद आज भी ज़ुबान पे है

तुम्हारे हाथ की खिचड़ी का स्वाद आज भी ज़ुबान पे है


तुम्हारे हाथ की खिचड़ी का स्वाद

आज भी ज़ुबान पे है,

जैसे कोई पुराना गीत

अचानक गुनगुनाहट बन लौट आए।


वह सादा-सा कटोरा,

हल्दी की नरम पीली आभा,

ऊपर तैरती घी की पतली-सी रेखा,

सब कुछ स्मृति में अब भी गर्म है।


पहला कौर

हमेशा थोड़ा-सा सावधान होता था,

फिर दूसरा

अपने-आप भरोसा कर लेता।


तुम्हारे हाथों की वह महक—

न जाने कैसे

दाल-चावल से आगे बढ़कर

एक घर बना देती थी।


अब सालों बाद भी

जब कहीं खिचड़ी की भाप उठती है,

मैं अनायास ठहर जाता हूँ,

जैसे समय ने

एक पल के लिए

पीछे मुड़कर देखा हो।


स्वाद दरअसल

जीभ पर नहीं टिकता,

वह मन की तहों में बैठ जाता है।


और तुम्हारे हाथ की खिचड़ी,

आज भी

उसी कोमल गरमाहट के साथ

मेरे भीतर

धीरे-धीरे पक रही है।


मुकेश ,,,,,,,,

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