सुनो,
कब तक हम दोनों
अलग-अलग हिमखंड बने रहेंगे?
तुम अपनी शीतलता में खड़े हो,
मैं अपनी सफेदी में।
और बीच में
सन्नाटा
हमारी धड़कनों को अलग करता है।
आओ,
हम पिघलें,
धीरे-धीरे,
अपने भीतर की जलधारा में।
आओ,
वह ठंडी शिराओं की नदियाँ
एक हो जाएँ,
एक दरिया बनकर बहें।
तुम मेरी धारा बनो,
मैं तुम्हारा संगीत;
और जब मिलेंगे
हमारे ताप और ठंड
एक साथ लय में घुल जाएँ
तब पता चलेगा
कि हिम भी,
जब प्रेम में पिघलता है,
तो सागर बन जाता है।
आओ,
और इस दरिया में
अपने भय, अपनी दूरी,
और अपनी सन्नाटियों को
साथ बहा दें।
क्योंकि केवल बहते हुए ही
हम अपने अस्तित्व को पा सकते हैं,
और केवल मिलकर ही
हम अनंत बन सकते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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