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Thursday, 19 February 2026

रेत् के नीचे नदी -- भाग नौ

 रेत् के नीचे नदी -- भाग नौ 

इधर काफी दिनों से दिन और रात का एक बहुत बड़ा हिस्सा कहानी और कहानी की केंद्रीय पात्र यानि की नाईका के बारे में ही सोचते हुए खर्च हो जाता है। 

नाईका यानी कि "यमी " के बारे में जितना ही सोचता हूँ उतना ही उलझता जाता हूँ। 

शुरू में तो लगा था सीधी - सादी और कुछ कुछ विशिष्टता लिए हुए इस पात्र को एक छोटी और प्यारी सी कहानी गढ़ा जा सकता है, पर मामला इतना आसान नहीं दिख रहा।  

दरअसल मै यानी कहानी का सूत्रधार कहानी को अपने हिसाब से न बढ़ा कर पात्र के द्वारा खुद ब खुद लिखवा लेने के पक्ष में ज़्यादा रहा हूँ, और ऐसा पूर्व में 

मेरी कहनियों के साथ हुआ है।  जटिल से जटिल पात्रों ने अपने अंतरतम को खोल के कहानी को आगे बढ़ाते गए हैं।  पर यहाँ तो नाईका कुछ कहने और बताने को राज़ी नहीं। 

एक तो कुछ कुछ उसकी अंतर्मुखी प्रवृति कुछ स्त्री सुलभ विशेषताएं , खैर कोइ नहीं धीरे - धीरे ही सही छोटे - छोटे सूत्र पकड़ के ही आगे बढ़ते हैं। 

खैर,, फिलहाल हम लोग कहानी में उस जगह पे थे जहाँ नाईका अपनी किशोरा अवस्था से धीरे - धीरे आगे बढ़ रही थी। 

और वो बढ़ रही है हौले - हौले खिल रही है हौले - हौले सुबह के ताज़े फूल की तरह,

नाईका के रंग और अंग के खिलाव में एक शख्स है जो कुछ ज़्यादा ही आ चूका है  काफी  खिलाव आ रहा है, जिसे न केवल वो महसूस कर रही है बल्कि सभी महसूस कर रहे हैं खास कर विपरीत लिंगी और उसके हम उम्र।

और जिसकी खुशबू मोहल्ले टोले और आस पास के अलावा स्कूल व गली के नुक्कड़ व पास की दुकानों तक पहुंचने लगी है  

पर वह इन सब बातों से बेपरवाह अभी भी अपने छोटे भाई बहनो की देख भाल और पढ़ाई में व्यस्त है। 

पिता अपनी नौकरी और घर में आते ही बक्क झक्क मे व्यस्त हैं 

बड़ा भाई अपनी पढ़ाई में व्यस्त है 

छोटे भाई बहन खेल कूद और स्कूल में मस्त हैं 

माँ या तो बच्चे जन रही होती हैं या फिर एक स्कूल में टीचरी में व्यस्त है (माँ की ये नौकरी  जो घर के बढ़ते हुए खर्चो के लिए बहुत बड़ा सहारा है )

और इन सब के बीच नाईका कम उम्र में ही बेहद तनाव और बढ़ाव में है। 

ऐसे में कहानी में एक खुशनुमा मोड़ तब आता है जब - नाईका के पड़ोस में एक पास के गाँव के परिवार बस जाता है। 

परिवार में कई भाई बहन हैं - सभी पढ़ने में ठीक हैं - बड़ा बेटा पढ़ाई में अच्छा है जो अपने कैरियर के लिए बेहद सचेत है। 

देखने में भी ठीक ठाक - भरा और गठीला बदन - खिलता गेंहुआ रंग - ठीक ठाक नाक नक्श - बात चीत में चतुर 

इस पात्र का नाम हम कुछ भी रख लेते हैं 

चलो हम इस पात्र का नाम "राजा " रख लेते हैं 

कल्पना करिये 

राजा की - एक गंवई पृष्ठभूमि का लड़का 

उम्र  - बीस के आस पास 

क़द - दरमियाना 

जिस्म - गठा गठा 

रंग - खुलता गेंहुआ 

आँखे - सामान्य से कुछ बड़ी 

कुल मिला के एक आकर्षक सा युवक 

जिसके चेहरे पे हल्की हलकी मुछे और हँसी 

हर वक़्त डेरा जमाये रहती है 

राजा हंसमुख है 

राजा इंटेलिजेंट है 

राजा अपने कर्रिएर के प्रति बेहद सजग है 

पर लड़कों वाले ऐब भी हैं 

मुँह में खैनी 

और कभी कभी छुप छुपा के पान खाने की आदत 

और दोस्तों के संग सिगरेट भी चल ही जाती है 

पर मुख्य बात जो कहानी और नाईका से रिलेटेड है, 

वो ये है 

राजा धीरे - धीरे नाईका के पूरे परिवार का विश्वास जीत लेता है 

अपने मीठे व्यवहार से 

और धीरे - धीरे जीत लेता है - नाईका यानी सुमन कुमारी के मन और दिल को 

हालांकि ये इतना आसान और सरल नहीं रहा - राजा के लिए 

वजह - नाइका का एक तो प्यार मुहब्बत के प्रति बहुत जानकारी का आभाव न होना 

और दूसरा दीदी वाली भयानक घटना का ट्रॉमा इस तरफ सोचने नहीं देता था 

पर 

राजा तो राजा ठहरा 

तेज़ 

ज़िद्दी 

समझदार 

और अपने धुन का पक्का 

और एक हद तक चालू और दुनियादार 

उसने पहले ही नज़र में भाप लिया था 

कि नाइका की सांवली सूरत में एक बेहद संजीदी और प्यारी लड़की छुपी हुई है 

लिहाज़ा राजा का व्यवहार नाइका के लिए बेहद ख़ास रहता 

और हुआ भी वही 

राजा धीरे धीरे नाइका के लिए ख़ास होता गया 

(अब आप लोग कल्पना को और आगे बढ़ाएं )

राजा और नाईका 

बैठे हैं साथ साथ 

राजा नाइका को बिहारी और रसखान समझते हुए 

प्रेम के गूढ़ अर्थों को समझा रहा है 

नाईका भी खुश खुश मुस्कुराती हुई समझ रही है 

राजा बीच बीच में हलके फुल्के ढंग से नाइका की तारीफ करता है 

नाइका रस विभोर हो उठती है 

अब राजा ही नाइका के स्कूल के प्रोजेक्ट बनवा रहा है 

राजा ही नाईका को आगे बी ऐ।  एम् ऐ में पढ़ना है समझा रहा है 

वर्ना नाइका तो सिर्फ साइंस और आर्ट्स साइड से ही पढ़ने को सब कुछ समझ रही है 

खैर 

कर्रिएर हो 

दुनियादारी हो 

या व्यक्तिगत समस्या हो 

सब का एक हल  - राजा - नाइका के लिए 

घर में कोइ फंक्शन हो दोनों साथ साथ काम कर रहे हैं 

दोनों साथ साथ हंस रहे है 

दोनों यानि की राजा और नाइका रात और स्कूल का वक़्त छोड़ दिया जाए 

तो साथ साथ बीत रहा है 

या बिताने की कोशिश कर रहे हैं 

या करते हैं 

नाईका को अब वही घर जो समस्याओं का बोझ लगता था 

या जिस घर में वह एक पल रहना नहीं चाहती थी 

वही घर स्वर्ग लगने लगा है 

अब उसी घर में और घर के बगल में उसे सारा जहाँ नज़र आता है 

दोनों खुश हैं राजा भी और नाइका भी 

पर नाईका के जीवन में कभी खुशी ज़्यादा वक़्त के लिए ठहरी कब 

तो हुआ यूँ 

कि दोनों की ये दोस्ती  जीने मरने की कास्मो वादों तक पहुँचती पहुँचती 

राजा भी अपने मकसद में कामयाब होता 

इसके पहले ही 

घर और बाहर कानाफूसियाँ होने लगीं 

मोहल्ले वाले और नाइका के अगल बगल रहने वाले चाचा ताऊ के परिवार वाले 

माता पिता के कान भरने लगे 

- आज कल राजा और सुमन दोनों बहुत हंस बोल रहे हैं - थोड़ा लगाम लगाओ 

- राजा और सुमन दोनों कल शाम छत पे क्या कर रहे थे देर तक - तुम लोग कुछ देखते क्यूँ नहीं 

   कल कुछ ऊंच नीच हो गया तो फिर क्या मुँह दिखाओगे 

तमाम बातें पिता सूरज के कानो में आते ही उनका बड़ी दीदी वाला रवैया शुरू 

तमाम बंदिशे - तमाम डांट फटकार 

पर चुप चुप रहने वाली नाइका जा जाने कैसे इस मामले में बेहद ज़िद्दी और बेधड़क हो गयी 

बोली मुझे तो राजा अच्छा लगता है - मै तो बोलूंगी 

मै कुछ गलत थोड़े ही कर रही हूँ 

आदि आदि बातें 

पर  - माँ पिता और भाई कहाँ मानने वाले थे 

हँसी खुशी के दिन 

बेहद उदास दिन में तब्दील हो गए थे 

घर का काम काज वैसे ही करना पड़ता था 

मार और डाँट राजा की वजह से और कहानी पड़ती 

पर कुछ ऐसे नाटकीय मोड़ आये - जिनका खुलासा नाइका की बातों से नहीं हो पाया 

पर हुआ यूँ कि 

कुछ दिनों बाद 

राजा बगल के मकान से हट कर दूसरी गली में चला गया था 

उस जमाने में मोबाइल और फ़ोन तो होते ही न थे 

लिहाज़ा बहाने से एक दूसरी की गली में आ जा के देख दाख के ही जी बहला लिया जाता 

पर कहानी में एक और नाटकीय मोड़ तब आता है 

(कहानी का वो मोड़ क्या है ? इस्पे हम आगे के सूत्रों के द्वारा पता लगाने की  कोशिश करेंगे )


( वैसे एक राज की बात बताऊँ ??

 कहानी का ये हिस्सा नाईका ने एक दिन किसी पुराने रजिस्टर के एक पीले पड़ते कागज़ में लिख के मुझे चुपके से दे गयी थी ये कहते हुए कि ये रख लो शायद तुम्हारे काम आये कहानी में  ) 


मुकेश इलाहाबादी -------------------

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