चलो, कुछ दूर बेवजह टहलें
आओ,
कुछ दूर बेवजह टहलें
बिना किसी मंज़िल के,
बिना किसी वजह के,
बस यूँ ही,
जैसे हवा में चलते हुए वक्त को छू लें।
चलो वहाँ तक जहाँ रास्ता थक जाए,
और हमारे कदमों की आहट
मिट्टी में मिलकर संगीत बन जाए।
जहाँ पेड़ अपनी छाया फैलाकर कहें
“थोड़ी देर बैठो,
दुनिया इतनी भी जल्दी में नहीं है।”
फिर तुम
धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रख दो,
जैसे बचपन किसी थकी हुई शाम को थाम लेता है।
हम दोनों हँसें
बिना किसी वजह के,
बिना किसी मतलब के,
बस एक-दूसरे की मौजूदगी पर।
रस्ते की पुलिया पर बैठकर
कुछ देर सुस्ता लें,
जहाँ धूप, हवा और तुम्हारी चूड़ी की आवाज़
मिलकर एक छोटा-सा ब्रह्मांड रच दें।
फिर लौटते वक्त
कोई भेलपुरी वाला दिख जाए,
तो एक ठोंगा ले लें
थोड़ा नमकीन, थोड़ा खट्टा,
थोड़ा वैसा जैसा ज़िंदगी का स्वाद होता है।
रास्ते में तुम
कभी मुझे टोको, कभी हँसो,
और मैं बस तुम्हारी मुस्कान के पीछे
अपनी शाम को ढलते हुए देखता रहूँ।
घर लौटें
हाथ में भेलपुरी का ठोंगा,
दिल में कुछ अधूरी बातें,
और एक पूरा दिन
जो किसी याद की तरह झिलमिला रहा हो।
मुकेश ,,,,,,,
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