राख में रखा नाम”
हम मिले
तो यूँ लगा
जैसे दो सज्दे
एक ही ख़ामोशी में
अदा हो गए हों।
न सवाल था,
न जवाब,
बस रूह ने रूह से
इतना कहा—
“पहचान है।”
तुम्हारे होने में
कोई दावा नहीं था,
और मेरे चाहने में
कोई फ़रियाद नहीं।
इश्क़ यहाँ
मांग नहीं बना,
वह तो
सब्र की तस्बीह पर
धीरे-धीरे घूमता रहा।
तुम पास थे,
मगर ऐसे
जैसे दुआ में
ख़ुदा,
महसूस तो होता है,
मगर छूने की
जुर्रत नहीं होती।
हमने
नाम से पहले ही
रिश्ते को
ख़ामोशी सौंप दिया।
जो कहा नहीं गया,
वही सबसे ज़्यादा
कहा गया।
कभी-कभी
दिल ने चाहा
कि पुकार लूँ तुम्हें,
मगर फ़ौरन
रूह ने थाम लिया
“कुछ इश्क़
आवाज़ नहीं चाहते।”
तुम मेरी तरफ़
कभी मुड़े नहीं,
और मैं
कभी चला नहीं।
हम दोनों
एक ही मोड़ पर
रुक गए।
अब जब
यह सब
याद बन गया है,
तो समझ आता है—
यह मिलन नहीं था,
यह
रिहाई थी।
तुम्हारा नाम
मैंने
दिल से मिटाया नहीं,
बस
राख में रख दिया।
जहाँ
हवा भी
इजाज़त लेकर
गुज़रती है।
मुकेश,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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