प्रेम : आदिवासी दर्शन की दृष्टि से
आदिवासी चिंतन में प्रेम किसी एक व्यक्ति की निजी अनुभूति नहीं, बल्कि जीवन–जगत की परस्परता का स्वाभाविक प्रवाह है। वहाँ प्रेम दो व्यक्तियों के बीच सीमित संबंध नहीं, बल्कि धरती, वन, नदी, पशु, पूर्वज और समुदाय के साथ एक जीवित संबंध है।
प्रेम को वहाँ अधिकार की भाषा में नहीं, सहभागिता की भाषा में समझा जाता है।
१. प्रेम का आधार : सह-अस्तित्व
अनेक आदिवासी समुदायों में धरती को “माँ” और जंगल को “जीवित सत्ता” माना जाता है। उदाहरण के लिए मध्य भारत के गोंड समाज में बड़ा देव की अवधारणा प्रकृति और जीवन के अदृश्य संतुलन का प्रतीक है। यहाँ प्रेम का अर्थ है—उस संतुलन को न तोड़ना।
प्रेम, किसी को पाने की उत्कंठा नहीं, बल्कि उसके साथ रहने की लय है।
जैसे नदी अपने किनारों को बाँधती नहीं, केवल सहारा देती है।
२. अपेक्षा नहीं, उत्तरदायित्व
आदिवासी जीवन-पद्धति में संबंध व्यक्तिगत स्वार्थ से अधिक सामुदायिक उत्तरदायित्व से जुड़े होते हैं। विवाह भी केवल दो व्यक्तियों का बंधन नहीं, दो कुलों और दो परंपराओं का मिलन है।
यहाँ प्रेम का अर्थ है—
“मैं तुम्हारे लिए क्या पा सकता हूँ” से अधिक
“मैं तुम्हारे साथ क्या निभा सकता हूँ।”
अपेक्षा वहाँ भी होती है, पर वह उपभोग की नहीं, सहभागिता की होती है।
यदि कोई खेत बोता है, तो पूरा समुदाय फसल में भागीदार होता है।
प्रेम भी ऐसा ही है—एक की मेहनत, सबकी तृप्ति।
३. स्त्री–पुरुष का संतुलन
कई आदिवासी समाजों में स्त्री को केवल संरक्षित होने वाली सत्ता नहीं, बल्कि निर्णय और परंपरा की वाहक माना गया है। खासी समाज (मेघालय) में वंश परंपरा मातृसत्तात्मक है।
यहाँ प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, संतुलन है।
पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के पूरक हैं—जैसे दिन और रात।
आदिवासी दृष्टि कहती है
असंतुलन से ही पीड़ा जन्म लेती है।
जब प्रेम अधिकार बन जाता है, तब प्रकृति भी रूठ जाती है।
४. प्रेम और समय
आदिवासी कथाओं और लोकगीतों में प्रेम क्षणिक आकर्षण नहीं, ऋतुओं की तरह चक्राकार है। वह बदलता है, पर समाप्त नहीं होता।
साल वृक्ष की भाँति
वह हर वर्ष पत्ते गिराता है,
पर जड़ें अडिग रहती हैं।
प्रेम में भी यही शिक्षा है
रूप, सामर्थ्य, धन, समय—सब परिवर्तनीय हैं।
पर यदि जड़ें विश्वास की हैं, तो परिवर्तन भय नहीं बनता।
५. मौन की भाषा
आदिवासी नृत्य और गीतों में शब्द कम, लय अधिक होती है।
प्रेम भी वहाँ शब्दों से अधिक संकेतों में जीवित रहता है।
एक साथ नाचना,
एक साथ बीज बोना,
एक साथ शोक मनाना
यही प्रेम की अभिव्यक्ति है।
यह मौन समझ है, जहाँ अपेक्षाएँ ऊँची आवाज़ में नहीं बोली जातीं, बल्कि साझा श्रम में पिघल जाती हैं।
आदिवासी दर्शन हमें सिखाता है कि प्रेम कोई पूर्णता का दावा नहीं करता। वह अपूर्णताओं के बीच संतुलन की साधना है।
यदि प्रेम को अधिकार से मुक्त कर
सह-अस्तित्व में बदला जाए,
तो अपेक्षाएँ बोझ नहीं, विकास का स्वाभाविक क्रम बन जाती हैं।
प्रेम तब प्रश्न नहीं रहता
वह एक जीवन-शैली बन जाता है,
जहाँ दो मन ही नहीं,
पूरा संसार सहभागी होता ह
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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