प्रेम : अपेक्षाओं और स्वभाव का दर्शन
प्रेम कोई स्थिर सिद्धांत नहीं है।
यह न तो शास्त्रों में पूरी तरह समाया है, न ही कविताओं में पूरी तरह व्यक्त हो पाया है। प्रेम को हर मनुष्य अपने अनुभव, अपने अभाव और अपनी आकांक्षाओं के अनुसार परिभाषित करता आया है और करता रहेगा।
समाज में प्रचलित एक सरल कथन है कि प्रेम में स्त्री ने पुरुष को अधिक धोखा दिया है। यह कथन न पूरी तरह सत्य है, न पूरी तरह असत्य। यह केवल अनुभवों के एक हिस्से का सामान्यीकरण है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और बहुस्तरीय है।
अनुभव बताता है कि पुरुष अक्सर प्रेम में रूप या सुविधा से अधिक जुड़ाव और स्वीकार्यता खोजता है। वह अभावों के साथ भी संबंध निभा लेता है—यदि उसे यह अनुभूति हो जाए कि वह किसी के लिए पर्याप्त है। पुरुष के लिए प्रेम में तृप्ति प्रायः समर्पण को जन्म देती है।
स्त्री का मन, इसके विपरीत, प्रेम में सुरक्षा ढूँढता है। यह सुरक्षा कई रूपों में प्रकट होती है—आर्थिक स्थिरता, मानसिक दृढ़ता, सामाजिक संरक्षण या भावनात्मक साहस। यह कोई दोष नहीं, बल्कि प्रकृति और सामाजिक संरचना द्वारा गढ़ी गई मनोवैज्ञानिक ज़रूरत है।
विरोधाभास तब उत्पन्न होता है जब प्रेम मिल जाने के बाद अपेक्षाएँ समाप्त नहीं होतीं। कभी धन की चाह जन्म लेती है, कभी रूप की, कभी सामर्थ्य की। और जब ये सब मिल जाएँ, तब समय, साहस या उपस्थिति की कमी शिकायत बन जाती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री को स्वयं नहीं पता कि उसे क्या चाहिए, बल्कि यह कि प्रेम की परतें खुलते-खुलते इच्छाएँ भी विकसित होती रहती हैं। जैसे-जैसे संबंध गहराता है, अपेक्षाएँ भी परिष्कृत होती जाती हैं।
पुरुष और स्त्री दोनों ही प्रेम में अपूर्ण हैं। दोनों अपने-अपने ढंग से सुरक्षा, मान्यता और संपूर्णता खोजते हैं। समस्या प्रेम में नहीं, बल्कि उस मौन समझ में है जो दो मनों के बीच विकसित नहीं हो पाती।
शायद प्रेम का वास्तविक दर्शन यह स्वीकार करना है कि कोई भी प्रेम पूर्ण नहीं होता—पर यदि दोनों अपनी-अपनी अपूर्णताओं को समझ लें, तो वही अपूर्णता संबंध की सबसे सच्ची नींव बन सकती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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