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Friday, 20 February 2026

दार्शनिक, प्रतीकात्मक नज़्में

दार्शनिक, प्रतीकात्मक नज़्में प्रस्तुत हैं। हर नज़्म स्वतंत्र है, पर शृंखला में बँधी हुई:


1. ठहराव


ठहराव

रुकना नहीं,

भीतर

कुछ समझ लेने का

क्षण है।


2. परछाईं


परछाईं

पीछा नहीं करती,

बस

साथ चलती है—

रोशनी के भरोसे।


3. वक्र


वक्र

भूल नहीं,

अनुभव का

स्वाभाविक

झुकाव है।


4. खुला आकाश


खुला आकाश

आज़ादी नहीं,

ज़िम्मेदारी है—

नीचे खड़े होने की।


5. अंतरा


अंतरा

दो पंक्तियों के बीच नहीं,

दो साँसों के

बीच रहता है।


6. छूटे कोने


जो छूट गए,

वे कोने नहीं,

मेरे

तेज़ चलने की

क़ीमत थे।


7. रेखाएँ


रेखाएँ

हथेली में नहीं,

निर्णयों में

उभरती हैं।


8. निशान


निशान

ज़मीन पर नहीं,

मन पर

रह जाते हैं।


9. अधूरापन


अधूरापन

कमी नहीं,

संभावना है—

आगे बढ़ने की।


10. भीतर की ज़मीन


भीतर की ज़मीन

कभी बंजर नहीं होती,

बस

धैर्य से

जोतनी पड़ती है।


11. धीमी रोशनी


धीमी रोशनी

कमज़ोरी नहीं,

आँखों की

सच्चाई है।


12. मौन का भार


मौन का भार

शब्दों से

ज़्यादा

वज़नी होता है।


13. साँसों का अंतराल


साँसों का अंतराल

याद दिलाता है—

हम

अभी ज़िंदा हैं।


14. अनदेखा वक़्त


अनदेखा वक़्त

सब देख रहा होता है,

बस

बिना गवाह के।


15. रुकी हुई दिशा


रुकी हुई दिशा

भटकाव नहीं,

कभी-कभी

सही मोड़ की

सूचना होती है।


मुकेश ,,,,,,

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