कामसूत्र के प्रथम सूत्र को नीचे क्रम से प्रस्तुत किया जा रहा है—
१. संस्कृत सूत्र
धर्मार्थकामेभ्यो नमः।
२. संधि-विच्छेद
धर्म + अर्थ + कामेभ्यः + नमः
(कामेभ्यः = काम + एभ्यः — चतुर्थी बहुवचन)
३. हिन्दी अर्थ
धर्म, अर्थ और काम— इन तीनों पुरुषार्थों को नमस्कार है।
अर्थात् जीवन के तीन मूल उद्देश्यों
(धर्म = सदाचार/कर्तव्य,
अर्थ = आजीविका/समृद्धि,
काम = इच्छा/सौंदर्य/आनंद)
को प्रणाम करके ग्रंथ का आरम्भ किया जाता है।
४. भावार्थ (दार्शनिक दृष्टि)
वात्स्यायन यहाँ काम को
धर्म और अर्थ से अलग नहीं करते
बल्कि उसे
जीवन की समन्वित यात्रा का
एक अंग मानते हैं।
काम यदि धर्म से संयमित हो
और अर्थ से संतुलित
तो वह पतन नहीं,
परिष्कार बन जाता है।
५. इसी पर एक नज़्म
धर्म को प्रणाम,
जो दिशा देता है।
अर्थ को नमन,
जो आधार बनाता है।
और काम को स्वीकार
जो जीवन में
रंग भरता है।
तीनों साथ हों
तो मनुष्य
पूर्ण होता है।
यदि काम
धर्म से जुड़ा रहे,
तो वह वासना नहीं,
सौंदर्य है।
यदि अर्थ
प्रेम से भीगा हो,
तो वह लोभ नहीं,
साधन है।
और जब
धर्म, अर्थ, काम
एक ही श्वास में
ठहर जाएँ
तभी
जीवन
समाधि की ओर
चुपचाप
चल पड़ता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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