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Tuesday, 24 February 2026

भोग से बोध तक

 भोग से बोध तक

भोग में डूबा तो लगा

सब पा लिया,

हाथों में दुनिया थी

और दिल में शोर।


रस था, रंग था,

सांसों की सरहद तक फैला हुआ अहसास,

पर हर लज़्ज़त के बाद

एक खालीपन चुपचाप बैठ जाता।


फिर एक दिन

थक गए चाहत के क़दम,

इच्छाओं ने स्वयं ही

मौन ओढ़ लिया।


उसी ख़ामोशी में

बोध ने दस्तक दी—

न कोई शोर,

न कोई दावा।


समझ आया

जो खोज बाहर थी

वो भीतर ही ठहरी थी,

और जो भोग में बिखरा

वही बोध में सिमट गया।


अब न पाने की हड़बड़ी है,

न खोने का डर—

बस एक सादा-सी रोशनी है

जो स्वयं में

पूर्ण है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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