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Wednesday, 18 February 2026

हवा के पुल पे लटका रहूँ या बर्फ़ की नदी में डूब जाऊँ?

 हवा के पुल पे

लटका हुआ हूँ,

नीचे यख़-ज़दा नदी,

ऊपर बेक़रार फ़िज़ा,

और दरमियान

मेरा मुज़्तर दिल।


एक तरफ़

झूलता हुआ यक़ीन है,

हर झोंका इम्तिहान,

हर लम्हा तअल्लुक़ का सवाल;

दूसरी तरफ़

सफ़ेद, साकित नदी,

जिसकी तह में

ख़ामोश गहराइयों का इशारा।


सोचता हूँ,

क्या लटकते रहना ही

ज़िंदगी की ताबीर है?

या फिर डूब जाना

इश्क़ की तकमील?


हवा कहती है,

ठहरना भी सफ़र है,

झूलना भी यक़ीन की एक शक्ल;

बर्फ़ की नदी पुकारती है

आओ, सुकूत की तह में उतर कर

अपनी सच्चाई से वाबस्ता हो जाओ।


मगर सच तो यह है

डूबना फ़ना है,

और लटकना तअल्लुक़;

दोनों में दर्द है,

दोनों में रूह की आज़माइश।


मैं आँखें मूँदकर

अपने सीने की सदा सुनता हूँ

धड़कन कहती है,

“ना पूरी तरह हवा हो,

ना पूरी तरह बर्फ़;

अपने अंदर की रवानी पहचानो।”


क्योंकि पुल पे लटकना

अगर डर से है

तो क़ैद है;

और नदी में डूबना

अगर मायूसी से है

तो ज़वाल।


इश्क़ का रास्ता शायद

इन दोनों के दरमियान है

जहाँ हवा को महसूस किया जाए,

मगर जड़ों को न छोड़ा जाए;

जहाँ नदी की ठंडक छुई जाए,

मगर सांस महफ़ूज़ रहे।


मैंने फैसला नहीं किया,

बस एक क़दम

और संभलकर रख दिया है।


हवा अब भी बह रही है,

नदी अब भी साकित है,

मगर मेरे भीतर

एक महीन-सी रवानी जागी है,

जो कहती है:


न लटका रहना मुक़द्दर है,

न डूब जाना नजात;

ज़िंदा रहना ही

सबसे बड़ा इख़्तियार है।


और शायद

इसी इख़्तियार में

रूह की असली आज़ादी छुपी है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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