बर्फ़ की बड़ी लहर और टूटी नाव
बर्फ़ की बड़ी लहर
सफ़ेद कफ़न-सी उठी हुई है
जमी हुई, मगर अंदर से मुतहर्रिक,
जैसे किसी ख़ामोश क़ियामत का
मुअत्तल इशारा।
उसके दामन में
एक टूटी नाव पड़ी है
बे-सफ़ीना, बे-नाविक,
अपनी शिकस्ता तख़्तियों में
सदियों की थकन समेटे हुए।
नदी का सीना
यख़-बस्ता है,
मगर तह में
आब का रग-रग बहता है—
साकित भी, रवाँ भी।
वो लहर
जो कभी मौज थी,
अब जमी हुई तक़दीर है;
और नाव
जो कभी सफ़र की ताबीर थी,
अब किनारे की तफ़्सीर बन गई है।
हवा जब गुजरती है
तो शिकस्ता लकड़ी से
एक मंद-सी सदा उठती है—
नाला नहीं,
बस एक सिसकती हुई दुआ,
जो फ़िज़ा में घुलकर
रूहानी महक बन जाती है।
मैं उस लहर के साये में
ठहर कर सोचता हूँ—
क्या हर इनहिदाम
दरअसल इब्तिदा की शक्ल नहीं होता?
नाव की कीलें ज़ंग-आलूदा,
रस्सियाँ मुंतशिर,
मगर उसके जिस्म पर
आब की ख़ुश्बू अब भी बाक़ी है
जैसे इश्क़
रुख़्सत होकर भी
असर छोड़ जाता है।
बर्फ़ की बड़ी लहर
धीरे-धीरे दरकती है,
एक महीन शिगाफ़
उसकी पेशानी पर उभरता है
और उसी शिगाफ़ से
धूप की पतली किरन
राह पाती है।
टूटी नाव
उस किरन को थामे हुए है,
गुमनाम, ग़ैर-मअमूर,
मगर किसी अनदेखे सफ़र की
शाहिद।
न कोई मुसाफ़िर
जो दास्तान पूछे,
न कोई मल्लाह
जो साहिल की तस्दीक़ करे;
सिर्फ़ ख़ामोशी का इज़हार है,
और यख़-ज़दा आब की तस्बीह।
मैं लौटने को होता हूँ
तो महसूस करता हूँ
यह शिकस्ता नाव
मक़ाम नहीं, मआनी है;
यह बर्फ़ की लहर
अंत नहीं, इम्तिहान है।
और फ़िज़ा में घुली
वही पुर-असर महक कहती है
हर जमी हुई मौज के नीचे
रवानी महफ़ूज़ रहती है,
हर टूटी नाव में
सफ़र की रूह ज़िंदा रहती है।
बस देखने वाली निगाह चाहिए,
और ठहरने वाला दिल।
मुकेश ,,,,,,
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