बर्फ़ की नदी पे
नंगे पाँव उतरना
कोई शौक़ नहीं
एक इकरार है
कि ठंड को छुए बिना
गरमाहट का सच नहीं खुलता।
पहला क़दम रखते ही
सांस अटक जाती है,
एड़ियों से दिल तक
एक सिहरन दौड़ती है
जैसे याद ने अचानक
अपना दरवाज़ा खोल दिया हो।
सफ़ेद चुप्पी
पाँवों के नीचे चरमराती है,
हर चरमराहट में
टूटे हुए लम्हों की किरचें हैं,
जो चुभती तो हैं,
मगर खून नहीं निकालतीं—
सिर्फ़ एहसास जगाती हैं।
मैं धीरे-धीरे चलता हूँ,
कि कहीं यह जमी हुई नदी
मेरे बोझ से टूट न जाए;
फिर समझ आता है
टूटना ही उसका मुक़द्दर है,
और बहना उसकी अस्ल।
ठंड अब दुश्मन नहीं लगती,
वह एक दरवेश है—
जो हर कदम पर पूछता है,
“क्या तुम सच में ज़िंदा हो?”
नंगे पाँव
मैं अपने भीतर की आग को महसूस करता हूँ—
एक महीन ताप,
जो बर्फ़ को नहीं,
मेरे डर को पिघलाता है।
आसमान धुँधला है,
हवा में धुएँ-सी उदासी,
पर इसी उदासी के बीच
एक रूहानी महक उठती है
जैसे सर्द सांस में
कोई दुआ घुल गई हो।
बर्फ़ की नदी पे चलते-चलते
मैं जान पाता हूँ—
हर सख़्ती के नीचे
कोई नरमी छुपी है,
हर जमे हुए पल के नीचे
कोई बहती हुई रग।
और जब आख़िरी क़दम रखता हूँ,
पाँव सुन्न हैं,
मगर दिल गरम
क्योंकि मैंने ठंड को छूकर जाना,
कि जीवन
सिर्फ़ धूप में नहीं,
बर्फ़ पर नंगे पाँव चलने में भी है।
उस पार पहुँचकर
मैं मुड़कर देखता हूँ
मेरे पैरों के निशान
धीरे-धीरे मिट रहे हैं,
पर भीतर
एक रास्ता हमेशा के लिए
उभर आया है।
मुकेश ,,,,,
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