एक तनहा स्त्री और मोबाइल सर्फिंग
रात के साढ़े ग्यारह बजे
जब पड़ोस की आख़िरी बत्ती बुझती है
और रसोई में रखा बर्तन भी
ठंडा हो चुका होता है,
वो अपने बिस्तर के सहारे
मोबाइल खोलती है।
दिन भर की सधी हुई आवाज़,
नपे-तुले जवाब,
घर–दफ़्तर के बीच झूलती समझदारी
सब उतार कर
वो उँगलियों को
स्क्रीन पर रख देती है।
सबसे पहले
ख़बरों पर नज़र
दुनिया में क्या टूटा,
कहाँ क्या महँगा हुआ,
किसने किसे क्या कहा।
जैसे उसकी अपनी बेचैनी
वैश्विक हो।
फिर रील्स शुरू होती हैं
तीस सेकंड की हँसी,
किसी का ट्रेंडिंग डांस,
किसी की “मॉर्निंग रूटीन”
जिसमें सब कुछ चमकता हुआ।
वो मुस्कुरा कर
स्क्रॉल कर देती है।
फिर कुछ मोटिवेशनल वीडियो
“खुद से प्यार करो”,
“किसी के इंतज़ार में मत रहो”,
“स्ट्रॉन्ग वुमन बनो”—
वो आधा सुनती है,
आधा महसूस करती है,
और आधा अपने अंदर
रख लेती है।
कभी कुकिंग रील्स—
नई रेसिपी,
सजावटी थाली,
मीठी आवाज़ में समझाती कोई औरत—
वो सोचती है,
“मैं भी बना सकती हूँ…”
फिर याद आता है
खाने वाले कितने हैं।
कभी शायरी वाली रील—
धीमी आवाज़ में
“तन्हाई”, “इंतज़ार”, “आदत” जैसे शब्द
वो एक पल को ठहरती है,
जैसे किसी ने
उसका हाल चुरा लिया हो।
फेसबुक पर
वो पुरानी सहेलियों की पोस्ट पढ़ती है
बच्चों की तस्वीरें,
परिवार की छुट्टियाँ,
सजावट से भरी सालगिरहें।
वो दिल का इमोजी भेज देती है,
और अपने दिल को
समझा देती है।
कभी वो
महिला समूहों की पोस्ट पढ़ती है—
रिश्तों की उलझनें,
पति की बेरुख़ी,
स्वाभिमान की बातें
वो चुपचाप पढ़ती है,
जैसे कोई आईना हो
जिसमें अपना चेहरा दिखता हो।
कभी पुरानी चैट तक जाती है
जहाँ बातें लंबी थीं
और रात छोटी।
अब जवाब छोटे हैं
और रात लंबी।
उसकी उँगलियाँ
एक नाम पर रुकती हैं,
फिर आगे बढ़ जाती हैं
जैसे आत्मसम्मान
इच्छा से थोड़ा भारी हो।
मोबाइल की बैटरी
धीरे-धीरे कम होती है,
रील्स बदलती रहती हैं,
चेहरे बदलते रहते हैं
पर उसकी तनहाई
वही रहती है।
आख़िर में
वो स्क्रीन बंद करती है।
कमरा अँधेरा हो जाता है।
नीली रोशनी बुझ जाती है
मगर भीतर की
हल्की-सी चमक
अब भी जागती रहती है।
वो करवट बदलती है
खाली जगह की तरफ़।
और सोचती है
कल शायद
मैं कम स्क्रॉल करूँगी,
और ज़रा-सा
खुद को ज़्यादा पढ़ूँगी।
मुकेश ,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment