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Tuesday, 24 February 2026

अगर वास्को डी गामा न होता…

 अगर वास्को डी गामा न होता…

इतिहास की किताब

एक नाम पर उँगली रखती है

और कहती है,

“यहीं से शुरू हुआ रास्ता।”


पर समुद्र

किसी एक नाव का मोहताज नहीं था।


अगर Vasco da Gama

अपनी पालें न खोलता,

तो क्या लहरें रुक जातीं?

क्या हिंद महासागर

अपनी नमकीन स्मृति भूल जाता?


भारत

कोई खोया हुआ द्वीप नहीं था

वह मसालों की ख़ुशबू में,

सदियों पुराने व्यापार में,

काफ़िलों की धूल में

पहले से दर्ज था।


खोज

अक्सर खोजी की नहीं होती,

नज़र की होती है।


किसी ने समुद्र के पार से देखा

और कहा— “मिल गया।”

किसी ने तट पर खड़े होकर सोचा—

“हम तो यहीं थे।”


अगर वह न होता,

कोई और होता

क्योंकि हवाएँ

दिशाओं की साज़िश रचती रहती हैं।


पर सवाल यह नहीं

कि कौन पहुँचा;

सवाल यह है

किसने किसे खोजा?


समुद्र ने यूरोप को बदला,

या भारत ने समुद्र को?


इतिहास एक लेंस है

जिस ओर मोड़ दो,

वहीं से शुरुआत दिखती है।


पर सच शायद यह है

धरती गोल है,

और रास्ते अनंत।

कोई न कोई

किसी न किसी दिन

इन तटों तक आता ही।


भारत

किसी कम्पास की सुई नहीं था

जो किसी एक हाथ से तय होता;

वह तो सदियों से

खुद एक दिशा था।


तो अगर वास्को डी गामा न होता

तो भी

लहरें चलतीं,

पालें खुलतीं,

और कोई और नाव

कहती

“हमने खोज लिया।”


जबकि

धरती चुपचाप मुस्कुराती—

“मैं तो पहले से यहाँ थी।”


मुकेश ,,,,,,,,,

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