ख़ामोशी की इबादत
ख़ामोशी आज
मेरे पास बैठी है
बिलकुल तुम्हारी तरह,
बिना कुछ कहे
सब कुछ कहती हुई।
हवा ने जब
दीपक की लौ से
धीरे-से बात की,
तो साया समझ गया
कि उजाला
सिर्फ़ आँखों का मोहताज नहीं।
इस आँगन में
जहाँ साँसें
ज़िक्र बन जाती हैं,
और धड़कनें
तस्बीह की तरह
उँगलियों में फिसलती हैं,
वहाँ वक़्त
अपने जूते उतारकर
नंगे पाँव चलता है।
रात की पेशानी पर
जब नींद
चुपचाप हाथ रखती है,
तो सपने
किसी पुराने ख़त की तरह
ख़ुद-ब-ख़ुद खुलने लगते हैं
स्याही अब भी गीली,
मानी अब भी ज़िंदा।
मैंने देखा है
रूह को
अपने ही साए से
लिपटते हुए,
जब दुनिया की थकान
हड्डियों में उतर आती है।
उस लम्हे
कोई फ़रिश्ता नहीं उतरता,
बस एक एहसास
सीने के दरवाज़े पर
दस्तक देता है—
और कहता है,
“डरो मत,
तुम अकेले नहीं हो।”
यादें यहाँ
तस्वीरें नहीं बनतीं,
वे सुगंध हैं
जो अचानक
किसी दुआ के बीच
महक उठती हैं।
तुम्हारा होना
अब किसी शक्ल में नहीं,
तुम एक दिशा हो—
जिस तरफ़
मेरी तन्हाई
सज्दा करती है।
और जब
सब कुछ
अदृश्य हो जाता है,
तब समझ आता है
ईश्वर
कहीं बाहर नहीं,
वह इसी ख़ामोशी में
धीरे-धीरे
सांस ले रहा है।
आज फिर
दिल ने यही सीखा
पूरा होना
किसी के मिलने से नहीं,
बल्कि
अपने बिखरे टुकड़ों को
रोशनी में
समेट लेने से होता है।
और उस रोशनी में
अब भी
एक नर्म-सा सुकून है
जो कुछ भी नहीं माँगता,
सिर्फ़
ठहर जाने को कहता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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