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Sunday, 22 February 2026

ख़ुद से भागते हुए एक दिन खुद से ही टकराना

 ख़ुद से भागते हुए एक दिन खुद से ही टकराना


हम लगातार भागते हैं

शोर, भीड़, काम, रिश्तों की दौड़ में।

हर कदम पर

हम सोचते हैं

कहीं कोई और मिल जाएगा,

कहीं कोई दर्द छुप जाएगा।

पर एक दिन

हम खुद से ही टकरा जाते हैं।

आईना नहीं,

कोई चेहरा नहीं,

बस वही अदृश्य सन्नाटा

जिससे हमने हमेशा भागने की कोशिश की।

वो टक्कर चुपचाप होती है,

बिना किसी चेतावनी के।

और तभी हमें समझ आता है

दर्द, डर, अधूरी ख्वाहिशें

हमारे अपने अंदर ही हैं।

हम उठते हैं,

देखते हैं,

और पहली बार सामना करते हैं

ख़ुद की असली तस्वीर से—

जो हमेशा हमारे साथ थी,

बस हमने उसे नजरअंदाज किया।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,

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