मैंने आज
दिल के हाशिए पर
एक नई किताब खोली है
नाम रखा है
अप्रेम की अभ्यास पुस्तिका
पहला सबक यह है
कि किसी की आवाज़ को
अपनी रगों में उतरने न दिया जाए
नाम को ज़ुबाँ पर लाने से पहले
होठों को तहज़ीब सिखाई जाए
दूसरा सबक
ख़्वाबों की तरतीब बदल देना
जहाँ उसका चेहरा उभरे
वहाँ फ़ौरन कोई और मंज़र रख देना
ताकि तसव्वुर की रौ
कहीं और मुड़ जाए
तीसरा सबक
याद को मुहलत न देना
वह आती है तो
दरवाज़ा खुला न पाए
रूह की चौखट पर
ख़ामोशी का पहरा हो
मैं रोज़ यह मश्क़ करता हूँ
दिल को समझाता हूँ
कि मोहब्बत कोई लाज़िमी फ़र्ज़ नहीं
एक इख़्तियारी इबारत है
जिसे चाहे तो पढ़ो
चाहो तो छोड़ दो
मगर हर दफ़ा
किसी न किसी सफ़्हे पर
स्याही फैल जाती है
एक अनचाहा लफ़्ज़
बार बार लिख जाता है
इश्क़
अप्रेम की यह किताब
साफ़ नहीं रह पाती
हर मश्क़ के बाद
कोई पुराना एहसास
हाशिए पर उग आता है
शायद दिल की फ़ितरत में
इनकार मुकम्मल नहीं होता
हर नफ़ी के पीछे
एक मख़फ़ी इकरार छुपा रहता है
मैं फिर भी
इस अभ्यास पुस्तिका को
संभाल कर रखता हूँ
कि कम अज़ कम
अपने आप से यह कह सकूँ
मैंने कोशिश की थी
मगर सच यह है
अप्रेम सीखा जा सकता है
पर निभाया नहीं जाता
मुक़ेश,,,,,,,,,,,,,,,,,
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