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Thursday, 19 February 2026

न धूप न वर्षा केवल आकाश

आज मैंने तय किया

कि न धूप को पुकारूँगा

न वर्षा की प्रतीक्षा करूँगा


मौसमों के बीच

जो निरंतर फैला रहता है

उसी आकाश को देखूँगा


धूप आती है

तो अपनी चमक का अहंकार लाती है

वर्षा आती है

तो स्मृतियों की भीगी हुई गठरी


पर आकाश

न उजाला माँगता है

न बादलों का सहारा

वह बस रहता है

विस्तृत

असंलग्न

अडिग


मैंने अपने भीतर

एक छोटा सा आकाश खोजा है

जहाँ न उम्मीद की चुभन है

न निराशा की नमी


सिर्फ़ एक खुलापन है

जिसमें विचार

पक्षियों की तरह आते जाते हैं

और भावनाएँ

बादल बनकर घिरती हैं

पर टिकती नहीं


न धूप का आग्रह

न वर्षा की जिद

केवल होना


शायद शांति

यही है

कि हम मौसमों से परे

अपने भीतर के आकाश को पहचान लें


जहाँ हर परिवर्तन

केवल एक गुज़रती हुई छाया है

और शेष बचा रहता है

अनंत विस्तार


मुक़ेश,,,,,,,,,,,

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