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Thursday, 19 February 2026

इश्क़ में पागलपन ज़रूरी है

 इश्क़

सलीके से नहीं होता।

वह दस्तावेज़ों में दर्ज

कोई संतुलित अनुबंध नहीं

वह एक बे-क़ायदा धड़कन है

जो वक़्त की तरतीब बिगाड़ देती है।


इश्क़ में थोड़ा-सा जुनून

ज़रूरी है

वह बेख़ुदी

जिसमें नाम लेते ही

आवाज़ बदल जाए,

वह बेसब्री

जिसमें इंतज़ार

इबादत बन जाए।


होश के साथ

मोहब्बत निभाई जा सकती है,

पर इश्क़?

इश्क़ तो होश की हद से

ज़रा आगे शुरू होता है।


जब रात की तन्हाई में

एक ही चेहरा

सारी कायनात पर छा जाए,

जब ख़्वाब

हक़ीक़त से ज़्यादा यक़ीं दिलाएँ

वहीं से

उस पागलपन की शुरुआत होती है

जो इश्क़ को

महज़ रिश्ता नहीं रहने देता।


पर यह पागलपन

तबाही नहीं,

तख़्लीक़ भी है।

इसी से शेर जन्म लेते हैं,

इसी से राग पिघलते हैं,

इसी से एक साधारण दिल

रूहानी सफ़र पर निकल पड़ता है।


इश्क़ में पागलपन ज़रूरी है

इतना कि दुनिया अजनबी लगे,

पर इतना भी नहीं

कि ख़ुद से रिश्ता टूट जाए।


आख़िर

इश्क़ वह आग है

जो जला भी सकती है,

और उजाला भी कर सकती है।


फ़र्क़ बस इतना है

तुम उसे होश से छुओगे

या थोड़ी-सी दीवानगी से।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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