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Wednesday, 18 February 2026

मुकेश बाबू, याद करो,

 मुकेश बाबू,

याद करो, 

आख़िरी बार

कब

खिलखिला कर

हँसे थे?

ऐसी हँसी

जो वजह न पूछे,

जो बीते कल का

हिसाब न रखे।

कब

दिल ने

बिना सोचे

खुद को

हवा में छोड़ दिया था?

अगर जवाब

धुंधला है,

तो समझो—

हँसी

अब भी कहीं

तुम्हारा इंतज़ार

कर रही है।

आज नहीं तो कल,

एक पल

उसे वापस बुलाना, 

सिर्फ़

अपने लिए।

मुकेश्,,,

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