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Saturday, 12 July 2014

अंधेरे मे भी झिलमिलाती है

अंधेरे मे भी झिलमिलाती है
ज़िंदगी अब भी मुस्कुराती है

दिन तो आवारा हो गया पर
सांझ तेरी याद कुनमुनाती है

तू लगती है गुलशन गुलशन
ख्वाहिशें पंख फड़फड़ाती हैं !

हवेली खंडहर हो गयी मगर
कोयल आज भी गा जाती है

तुम कुछ नही बोलती हो पर
तेरी आँख चुगली कर जाती है

मुकेश इलाहाबादी ----------------

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