रात 2 बजे ऑनलाइन शहर
घड़ी ने दो बजाए हैं
पर शहर सोया नहीं।
सड़कें भले खाली हों,
स्क्रीनें अब भी जगमगा रही हैं।
खिड़कियों के भीतर
नीली रोशनी का उजाला है,
किसी कमरे में
कोई हँस रहा है अकेले,
किसी में
कोई चुपचाप स्क्रोल कर रहा है
अपनी ही बेचैनी।
रात 2 बजे
ऑनलाइन शहर
और ज़्यादा सच्चा हो जाता है
दिन के मुखौटे उतर जाते हैं,
स्टेटस की सजावट हट जाती है।
यहीं
अनसेंट मैसेज लिखे जाते हैं,
पुरानी तस्वीरें देखी जाती हैं,
और प्रोफ़ाइल पिक्चर के पीछे
छुपी हुई थकान पढ़ी जाती है।
किसी की “लास्ट सीन”
दिल की धड़कन-सी लगती है,
किसी का “टाइपिंग…”
उम्मीद की तरह चमकता है
और फिर
अचानक गायब हो जाता है।
इस वक़्त
शहर दो हिस्सों में बँट जाता है
एक जो सचमुच सो रहा है,
और एक
जो नींद से भाग रहा है।
रात 2 बजे ऑनलाइन शहर
दरअसल
हजारों कमरों का साझा अकेलापन है
जहाँ हर कोई
किसी को ढूँढ रहा है,
पर नाम नहीं ले पा रहा।
सुबह होते ही
यह सब सामान्य हो जाएगा
लोग फिर से व्यस्त दिखेंगे,
मुस्कानें लौट आएँगी।
पर रात के इस पहर में
शहर जानता है
वह जाग रहा है
क्योंकि भीतर कुछ
अब भी सोया नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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