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Saturday, 21 February 2026

वृद्धाश्रम की खिड़की से दिखता बचपन

 वृद्धाश्रम की खिड़की से दिखता बचपन


खिड़की के पास रखी कुर्सी

अब उसकी स्थायी जगह है

पीठ झुकी हुई,

हाथों की नसें उभरी हुई,

और आँखों में

एक लंबा इतिहास।


वह रोज़ उसी समय

परदे को थोड़ा-सा हटाता है

बाहर पार्क में

कुछ बच्चे दौड़ रहे होते हैं।

उनकी हँसी

हवा को हल्का कर देती है।


वृद्धाश्रम की दीवारें

बहुत कुछ जानती हैं—

छूटे हुए घर,

धीरे-धीरे कम होते फोन,

और त्योहारों की औपचारिक मिठास।


पर खिड़की के उस पार

दुनिया अब भी नई है

एक बच्चा गिरकर उठता है,

दूसरा बिना कारण हँस पड़ता है,

कोई पतंग को आकाश समझ बैठता है।


वह उन्हें देखता है

जैसे अपने ही पन्ने पलट रहा हो

कभी वह भी

इसी तरह दौड़ा था,

धूप को जेब में भर लेने की जिद में।


अब कदमों में वह फुर्ती नहीं,

पर स्मृतियों में अब भी

एक कच्चा आँगन बचा है—

जहाँ माँ की आवाज़

और पिता की छाया

साथ-साथ चलती थी।


वृद्धाश्रम की खिड़की

दरअसल एक समय-द्वार है

जहाँ वर्तमान की धीमी साँस

और अतीत की तेज़ धड़कन

एक साथ सुनाई देती हैं।


वह मुस्कुराता है

बाहर बच्चों को नहीं,

अपने भीतर के उस लड़के को

जो अब भी

किसी पेड़ पर चढ़ने की तैयारी में है।


शाम ढलती है,

बच्चे घर लौट जाते हैं,

पर खिड़की पर बैठा वृद्ध जानता है

बचपन कहीं जाता नहीं,

बस उम्र की परतों के नीचे

धीरे-धीरे

धड़कता रहता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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