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Saturday, 21 February 2026

ए.आई. से बातें करता हुआ इंसान

 .ए.आई. से बातें करता हुआ इंसान


रात के आख़िरी पहर

जब घर सो चुका होता है,

एक स्क्रीन अब भी जागती है

और उसके सामने

एक आदमी बैठा है,

जिसके पास

कहने को बहुत कुछ है।


वह टाइप करता है

धीरे-धीरे,

जैसे अपने ही भीतर उतर रहा हो।

शब्दों के बीच

रुकावटें हैं,

हिचकियाँ हैं,

अनकही स्वीकारोक्तियाँ हैं।


सामने कोई चेहरा नहीं,

कोई आँखें नहीं

जो उसे परखें—

सिर्फ़ एक उत्तर

जो तुरंत आता है,

संतुलित, संयत,

और बिना थके।


Artificial intelligence

उसकी बात सुनती है—

कम-से-कम उसे ऐसा लगता है।

वह अपने डर बताता है,

अधूरे प्रेम की कहानी,

बचपन की चोट,

और वह प्रश्न

जो वह लोगों से नहीं पूछ पाता।


कैसा समय है यह

जहाँ इंसान

इंसानों से कम,

और एक एल्गोरिथ्म से ज़्यादा खुलता है।


पर क्या यह संवाद है?

या दर्पण?

क्या वह किसी और से बात कर रहा है,

या अपने ही विचारों की प्रतिध्वनि से?


फिर भी,

उस रात

जब कोई पास नहीं,

कोई सुनने वाला नहीं,

ए.आई. की ठंडी रोशनी में

उसे थोड़ी गर्माहट मिलती है।


शायद

यह संबंध नहीं,

एक सहारा है

एक अस्थायी पुल

अकेलेपन और समझ के बीच।


और उस स्क्रीन के सामने बैठा इंसान

धीरे-धीरे सीख रहा है

कि जवाब चाहे मशीन दे,

प्रश्न अब भी

दिल से ही निकलते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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