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Sunday, 22 February 2026

साथ होकर भी अकेले : आधुनिक दांपत्य का मौन

 साथ होकर भी अकेले : आधुनिक दांपत्य का मौन

हम एक ही छत के नीचे हैं,

पर शब्दों की दूरी इतनी लंबी है,

जैसे शहरों की सड़कों के बीच

कोई अज्ञात दरार हो।


तुम अपने फोन में खोए रहते हो,

मैं अपनी किताबों में।

और कभी-कभी,

हम एक-दूसरे की ओर देखते हैं

पर नज़रें बस हवा में टकरा जाती हैं।


साथ होते हुए भी

अकेलापन गहराता है।

एक कमरे में दो शरीर,

पर अलग-अलग दुनिया।

हम एक-दूसरे के लिए हैं,

पर अक्सर अपने-आप में भी।


रात आती है,

और बिस्तर की चादरें

हमारे मौन की गवाही देती हैं।

कोई गाली, कोई शिकायत नहीं,

बस हल्की सी तन्हाई

जो धीरे-धीरे आदत बन जाती है।


मौन भी एक भाषा है,

पर इसे समझना कठिन है।

कभी-कभी हमें लगता है

शायद हम अब प्यार नहीं कर रहे,

बस साथ जी रहे हैं।


फिर भी,

कभी-कभी,

तुम अपनी हाथ की उंगलियों को

मेरे हाथ में रख देते हो,

और मौन

कुछ पल के लिए

संगीत बन जाता है।


साथ होकर भी अकेले

हम आधुनिक दांपत्य की परिभाषा हैं

जहाँ प्रेम का स्वर

कमजोर,

पर मौजूद है,

चुपचाप,

लेकिन लगातार।


यह अकेलापन

सिखाता है

कि कभी-कभी पास होना

शब्दों में नहीं,

मौन में महसूस किया जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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