दो कमरों का प्रेम : निजी स्पेस की ज़रूरत
हम दो कमरे लेते हैं
एक तुम्हारा, एक मेरा।
दुनिया के शोर में
हम अपनी दीवारों की शांति ढूँढ़ते हैं।
तुम्हारा कमरा
सागर की तरह खुला है,
जहाँ हवा धीरे-धीरे
तुम्हारे विचारों के किनारे तक पहुँचती है।
और मेरा कमरा
जंगल की तरह सघन,
जहाँ मैं अपने भीतर की आवाज़
सुन सकता हूँ।
हम मिलते हैं
दरवाज़े के बीच,
कुछ शब्द बाँटते हैं,
कुछ मौन भी।
और यह दूरी
सिर्फ़ अलगाव नहीं,
पर प्रेम की गहराई बन जाती है।
तुम अपनी किताबों में खो जाती हो,
मैं अपनी धड़कनों में।
और जब हम एक दूसरे की ओर लौटते हैं,
तो हर झलक
नई ताजगी ले आती है।
पसंदीदा चुप्पियों में
हम समझते हैं
प्रेम का अर्थ
साथ होना ही नहीं,
एक-दूसरे को साँस लेने देना भी है।
दो कमरों का प्रेम
सिखाता है
कि स्वतंत्रता
न फ़ासला बढ़ाती है,
न दूरी;
बल्कि यह विश्वास की दीवारें बनाती है,
जो हमें और पास लाती हैं।
और जब रात होती है,
तब दो कमरे
एक-दूसरे की ओर झुकते हैं,
जैसे कोई नज़र से कहती हो
“तुम वहाँ हो, मैं यहाँ हूँ,
और यही पर्याप्त है।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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