तेरे होंठों की गर्मी,
मेरी साँस का थरथराना,
रात के गीले पंखो में
बुरा लगने का डर नहीं।
अंगुलियाँ तेरी,
मेरी पीठ पर आग बन जाती हैं,
जैसे हर नस में
चाँदनी उतर गई हो।
हमसे अलग ये कमरा
दीवारों के भीतर सांस लेता है,
हमारे मिलन को
चुपचाप छूता है।
तेरी छाती से सिर टिकाकर
मैं देह का स्वाद चखती,
त्वचा का कच्चा गंध
शरीर की मिट्टी में घुलता है।
तेरी आँखें जब खुलती हैं,
रहस्य के बंध खुल जाते हैं,
पलकों से रिसता
मेरे नाम का संगीत।
प्यासी पोरें
तेरी जाँघों के कांपते पलों में,
भोर से पहले
सब कुछ स्वप्न जैसा है।
तेरे नखून जब उतरते हैं
मेरी जाँघों की क्यारियों में,
मुझमें समा जाती है
अनकही छुअन की भाषा।
मेरे नंगे कंधे पर
तेरे होंठों की छाया,
मैं मिटती हूँ धीरे-धीरे
खुद में, तुझे समेट कर।
कमरे की खामोशी में
हमारा शरीर कविता हो गया है,
सांसों की लय पर
शब्द थिरक रहे हैं।
तू मुझमें घुल कर
एक नयी गंध रचता है,
जैसे पहली बारिश
सूखी मिट्टी पर।
तेरी जिह्वा के किनारे
मेरे रोंगटे मुस्कराते हैं,
रात का हर पहर
हमारी रचाई हुई दुनिया है।
तेरे बालों में उलझी
मेरी चाहत की अंगूठी,
तू खोलता है बिन कहे
उन जंजीरों को जो कभी थीं।
मेरे कूल्हे जब
तेरी मुट्ठियों में भर आते हैं,
आकाश भी
नीचा लगता है उन छुअनों के आगे।
लचकती साँसों में,
रग रग में तड़प,
तेरे चुम्बन से
अब नाम नहीं बचा मेरा।
दो जिस्म, पर एक आज़ादी,
एक आग, एक चुप्पी,
इस मिलन में,
रात की साड़ी उतार दी है हमने।
कोई गवाह नहीं,
कोई शर्त नहीं,
बस तेरी आहट में
मेरा खो जाना।
मुकेश ,,,,,,,
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