हिमखंडों का पिघलाव
कब तक हम दोनों हिमखंड बने रहेंगे,
अपनी ठंडी साँसों में कैद, एकाकी चोटी पर खड़े,
दूर पहाड़ों की गोद में, सूरज की किरणें ललचातीं,
पर हम पत्थर सा कठोर, न छूएँ एक-दूसरे को?
आओ थोड़ा आँच पैदा करें, प्रियतम,
तेरी उँगलियों से जलती लपटें छुएँ मेरी बर्फीली छाल,
धीरे-धीरे, जैसे बसंत की पहली बूँदें हिम को सहलातीं,
मेरी सतह पर बहें वो गर्म लालिमाएँ, चाटतीं, चूमतीं।
कब तक ये हिमकण अटके रहें नदी बनने को तरसते,
तेरा स्पर्श हो मेरी धमनियों में आग की धारा,
मेरी ठंडक में घुल जाए तेरी उष्णता, नग्न, बेधड़क,
जैसे शिव की जटाओं से गंगा का वेग बहता है, अनियंत्रित।
देखो, मेरी बर्फ पिघलने लगी है तेरे होंठों की गर्मी से,
हर बूँद में छिपी है वो इच्छा, जो रातों को सुलाती नहीं,
तेरी साँसें मेरी गोद में उतरें, नृत्य करें नग्न अंगों का,
मेरे हिमकुंड में डुबकी लगाएँ, उछालें लहरें कामुक।
आँच बढ़ाओ, प्रिय, अब और सह न सकूँ ये विरह की कँपकँपी,
तेरी छाती से लगकर मेरी बर्फ हो जाए नर्म जलधारा,
बहें हम एक होकर, पहाड़ों को चीरते, वादियों में खोकर,
हर मोड़ पर मिलन की लहरें उठें, चीखें आनंद की।
कभी न रुकें ये पिघलते क्षण, नदी बन हम समंदर को गले लगाएँ,
तेरे जल में मेरा जल घुल जाए, एक स्वाद, एक लय, एक उन्माद,
हिमखंड न रहें हम, नदियाँ बन बहें अनंत में विलीन होकर,
प्रेम का ये पिघलाव हो जाए शाश्वत, बिना तट के, बिना नाम के।
फिर भी, अगर ठंड लौट आए, तो फिर आँच पैदा करेंगे हम,
हर बार पिघलेंगे गहराई से, नई नदी बनकर बहेंगे,
क्योंकि प्रेम तो यही है—हिम से आग, आग से धारा,
और धारा से अनंत का संगम, बिंदु से ब्रह्मांड।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,
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