उसका हर रूप
एक
जब वो नाराज़ होती है,
उसे मनाने को जी करता है,
दो
जब वो चुप रहती है,
मन करता है उसे गुदगुदाकर हँसा दूँ,
तीन
जब वो सो रही होती है,
उसे देखते रहने का मन करता है,
चार
जब वो रील्स में गुम होती है,
पीछे से बाँहों में भर लेने का जी चाहता है,
पाँच
जब वो कुछ नहीं कर रही होती,
बिना वजह झगड़ने का मन करता है,
— मुकेश
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