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Monday, 23 February 2026

स्त्रियों के गहने जो चलन के बाहर हो गए हैं

 स्त्रियों के गहने जो चलन के बाहर हो गए हैं


स्त्रियों के गहने

जो कभी देह की भाषा थे,

अब संदूकों की चुप्पी बन गए हैं।


नथ की वह गोलाई,

जिसमें चाँद का टुकड़ा झूलता था—

अब शहर की सादगी में भारी लगती है।


बिछुए,

जो पांवों में बँधकर

संबंध का संकेत देते थे,

अब उँगलियों से उतरकर

डिब्बियों में सो रहे हैं।


हाथफूल

हथेलियों की शाख़ों पर खिला हुआ चाँदी का फूल,

जिसकी हर कड़ी में

स्पर्श की सौम्यता थी

अब सिर्फ़ दुल्हनों की तस्वीरों में बचा है।


करधनी की हल्की झंकार,

जो चाल को लय देती थी,

बदलती पोशाकों के साथ

अप्रासंगिक घोषित कर दी गई।


बोरला,

माथे के मध्य में टिका हुआ

आकाश का बिंदु

अब फैशन की रफ़्तार में

धीमा पड़ गया।


पायल की रुनझुन

कभी घर के भीतर

स्त्री की उपस्थिति की ध्वनि थी

अब फर्श संगमरमर का है,

और ध्वनियाँ दबा दी गई हैं।


ये गहने सिर्फ़ धातु नहीं थे,

वे सामाजिक संकेत थे

विवाह, आयु, क्षेत्र,

और पहचान की सांकेतिक भाषा।


पर आधुनिकता ने

हल्कापन चुना

देह से पहले सुविधा,

परंपरा से पहले गति।


अब अलमारियों में

मखमली डिब्बों के भीतर

सोया हुआ इतिहास है

जिसे कभी-कभी

त्योहारों पर जगाया जाता है।


स्त्रियों के ये गहने

चलन से बाहर नहीं हुए

वे समय की तह में रखे गए हैं,

जैसे स्मृति

जो अवसर पर ही पहनी जाती है।


शायद किसी दिन

फिर कोई स्त्री

उन्हें पहनकर आईने से पूछे

क्या मैं वही हूँ

जिसकी चाल में कभी

करधनी की लय बसती थी?


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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