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Monday, 23 February 2026

सर्कस का फटा हुआ पोस्टर

 सर्कस का फटा हुआ पोस्टर

अब भी दीवार से चिपका है

आधा उखड़ा, आधा बचा,

जैसे तमाशे की आख़िरी साँस।


उस पर एक जोकर की मुस्कान है,

जिसकी आँख पर दरार पड़ चुकी है—

हँसी काग़ज़ में है,

दर्द हवा में घुला हुआ।


कभी यही पोस्टर

गली-गली चिपकाया जाता था,

लाल-पीले रंगों में

आश्चर्य का वादा लिए।


“आइए देखिए—

शेर का खेल,

रस्सी पर उड़ती लड़की,

और आग के घेरे में छलाँग।”


सर्कस

चलता-फिरता संसार था

जहाँ ख़तरा, कौशल और संगीत

एक ही तंबू के नीचे सांस लेते थे।


पोस्टर सिर्फ़ विज्ञापन नहीं था,

वो सामूहिक कल्पना का निमंत्रण था—

दीवार पर टँगा एक स्वप्न।


फिर शहरों ने

मॉल खड़े कर लिए,

मनोरंजन ने स्थायी पते ले लिए,

और तंबुओं की जगह

कंक्रीट ने भर दी।


जानवरों के अधिकार,

बदलती अर्थव्यवस्था,

और डिजिटल चमत्कार

सर्कस धीरे-धीरे

इतिहास के पन्नों में सिमट गया।


अब यह फटा हुआ पोस्टर

समय का दस्तावेज़ है

जिसमें रंग उड़े नहीं,

बस फीके पड़े हैं।


दीवार चुप है,

पर काग़ज़ की सिलवटों में

अब भी ढोल की धीमी थाप

गूँजती है।


सर्कस का फटा हुआ पोस्टर

पूछता है—

क्या तमाशा ख़त्म हुआ,

या हमने विस्मय देखना छोड़ दिया?


मुकेश ,,,,,,,,,,


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