लट्टू घुमाने वाला बच्चा
अब गली में कम दिखाई देता है
उसकी उँगलियों की गाँठों में
कभी पूरा ब्रह्मांड घूमता था।
एक सूत की डोरी,
थोड़ा-सा अभ्यास,
और ज़मीन पर
गोल-गोल घूमता हुआ समय।
वो लट्टू
सिर्फ़ खिलौना नहीं था
गति का पहला पाठ था,
संतुलन का पहला विज्ञान।
बच्चा झुककर
उसके घूमने को देखता,
जैसे पृथ्वी अपनी धुरी पर
अपनी नियति समझ रही हो।
गली की धूल में
भौतिकी का सिद्धांत लिखा था
कोणीय वेग,
घर्षण,
और केंद्र की खोज।
लट्टू जितना स्थिर दिखता,
उतना ही तीव्र घूमता था
जैसे जीवन,
जो बाहर से शांत,
भीतर से व्याकुल गति।
फिर स्क्रीनें आईं,
अंगूठे ने उँगली की जगह ले ली,
और गोल-गोल घूमती चीज़ें
अब काँच के भीतर कैद हो गईं।
लट्टू घुमाने वाला बच्चा
धीरे-धीरे इतिहास बन गया
उसकी जगह
बैटरी से चलने वाले खेलों ने ले ली।
पर शोध की दृष्टि से देखें
तो वो लट्टू
लोक-तकनीक का सूक्ष्म मॉडल था
जहाँ खेल, कौशल और विज्ञान
एक ही धुरी पर घूमते थे।
आज भी
अगर कहीं कोई बच्चा
डोरी लपेटकर
लट्टू फेंकता है
तो समझिए
वक़्त फिर से ज़मीन पर
एक चक्कर लगा आया है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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