मदारी का खेल कहाँ खो गया
वो डुगडुगी की लय
जो गली के बच्चों की धड़कन से
ताल मिला लिया करती थी।
“देखो-देखो खेल तमाशा…”
एक गोल दायरा बनता था,
बीच में ज़मीन,
और आसमान तक उठती उत्सुक आँखें।
रस्सी पर चलता बंदर,
टोपी पहने, सलाम करता
और हम तालियाँ बजाते
जैसे कोई राज्याभिषेक हो रहा हो।
मदारी सिर्फ़ कलाकार नहीं था,
वो लोक-रंगमंच का चलता-फिरता विद्यालय था
जहाँ हास्य, व्यंग्य, नैतिकता
सब कुछ खेल-खेल में सिखाया जाता था।
उसकी डुगडुगी
जन-संवाद का पहला माइक्रोफ़ोन थी,
और सड़क
उसका खुला सभागार।
वो राजा और फ़क़ीर की कथा
एक ही साँस में कह देता,
और बच्चे समझ लेते
कि दुनिया बराबरी से नहीं चलती।
फिर शहर बदले,
स्क्रीनें चमकीं,
मनोरंजन ने टिकट और डेटा माँगा
और मदारी का दायरा
हाशिए पर खिसक गया।
आज शोध कहता है
लोक-कलाएँ
आर्थिक बदलाव की पहली शिकार होती हैं।
मदारी का खेल भी
बाज़ार के शोर में
धीरे-धीरे डूब गया।
अब बच्चे
यूट्यूब पर चमत्कार देखते हैं,
पर किसी डुगडुगी की धड़कन
उनके सीने से नहीं मिलती।
मदारी का खेल कहाँ खो गया
शायद हमारी स्मृति के किसी कोने में,
जहाँ अब भी
एक गोल दायरा बनता है,
और हम इंतज़ार करते हैं
कि कोई फिर से पुकारे
“देखो-देखो खेल तमाशा…”
मुकेश ,,,,,,,,,,
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