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Monday, 23 February 2026

बाइस्कोप वाला अब नहीं दीखता

बाइस्कोप वाला अब नहीं दीखता

वो रंगीन डिब्बा

जिसमें पूरा जहाँ

एक आँख से देखा जाता था।


“देखो-देखो बाइस्कोप देखो…”

उसकी खनकती आवाज़

गली के इतिहास में दर्ज है,

पर अब किसी आर्काइव में भी नहीं मिलती।


उस डिब्बे में

ताजमहल भी था,

रानी की सवारी भी,

और कहीं दूर का शहर

जो हमारे कस्बे से बड़ा लगता था।


बच्चे एक-एक कर

आँख लगाते थे उस छोटे-से शीशे पर,

और उनकी पुतलियों में

घूमती रहती थी एक चलती हुई दुनिया।


बाइस्कोप दरअसल

चलचित्र का जनतंत्रीकरण था

जहाँ सिनेमा

टिकटघर से निकलकर

गली के मोड़ तक आ गया था।


वो सिर्फ़ तमाशा नहीं था,

वो तकनीक का पहला स्पर्श था

हाथ से घुमाई जाने वाली रील,

लोक-संस्कृति और यांत्रिकी का संगम।


फिर समय ने

मल्टीप्लेक्स बनाए,

मोबाइल स्क्रीनें जगमगाईं,

और दृश्य

हथेलियों में सिमट गए।


बाइस्कोप वाला

धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया

जैसे लोक-कला

डिजिटल युग में

फुटनोट बन जाती है।


अब बच्चे

रील्स स्क्रॉल करते हैं,

पर किसी एक दृश्य पर

ठहरते नहीं।


बाइस्कोप में ठहराव था

एक-एक फ़्रेम

आश्चर्य की तरह खुलता था।


वो आदमी

सिर्फ़ चित्र नहीं दिखाता था,

वो सामूहिक विस्मय बेचता था—

दो पैसों में।


आज शोध की मेज़ पर

जब लोक-मनोरंजन की परतें खुलती हैं,

तो बाइस्कोप

एक भूली हुई कड़ी की तरह उभरता है

जहाँ कला, तकनीक और सड़क

एक ही धुरी पर घूमते थे।


बाइस्कोप वाला अब नहीं दीखता

पर उसकी आवाज़

अब भी किसी बूढ़ी गली में

धीरे-धीरे गूँजती है

“देखो-देखो… दुनिया देखो…”


मुकेश ,,,,,,,,,

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