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Monday, 23 February 2026

गर्ल्स इंटर कॉलेज की छुट्टी — एक दृश्य

 गर्ल्स इंटर कॉलेज की छुट्टी — एक दृश्य


घंटी बजती है

पहले एक ठहरी हुई ध्वनि,

फिर जैसे अचानक खुला हुआ आसमान।


गेट के भीतर से

सफ़ेद दुपट्टों का सैलाब निकलता है,

हँसी के छोटे-छोटे फव्वारे

धूप में चमकने लगते हैं।


किसी की चोटी खुल गई है,

किसी की कॉपी बाँह में दबा है,

किसी की आँखों में

अब भी अधूरी कविता तैर रही है।


सड़क के उस पार

कुछ लड़के यूँ ही खड़े हैं

जैसे बस यूँ ही गुज़र रहे हों,

पर उनकी निगाहें

घंटी से पहले ही इंतज़ार में थीं।


उनकी धीमी हँसी में

अधपके सपनों की शरारत है,

जेब में हाथ डाले

वो छुट्टी का वक़्त नापते रहे थे।


इधर सहेलियों की फुसफुसाहट

“अरे, आज तुम्हारा वाला नहीं दिख रहा…”

और फिर दबा-दबा-सा ठहाका,

दुपट्टों में छिपी धड़कनों का राज़।


सड़क के किनारे

रिक्शों की कतार है,

माएँ छाँव में खड़ी इंतज़ार करती हैं,

और हवा में टिफ़िन के बचे हुए अचार की महक।


दो सहेलियाँ

आख़िरी सीढ़ी पर रुककर

कुछ राज़ बाँटती हैं

जैसे दुनिया यहीं से शुरू होगी।


कोई चूरन की पुड़िया लेती है,

कोई पानी-पूरी वाले की ओर देखती है,

कोई बस यूँ ही

चलते-चलते पीछे मुड़कर

स्कूल को एक नज़र और देख लेती है।


धीरे-धीरे भीड़ छँटती है,

लड़के भी मुस्कुराते हुए बिखर जाते हैं,

गेट फिर शांत हो जाता है,

पर सड़क पर देर तक

हँसी और फुसफुसाहट की परछाइयाँ

चलती रहती हैं।


और धूप

उसी दीवार पर ठहरकर

अगली छुट्टी का इंतज़ार करने लगती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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