डायरी: सात दिन – भीड़, बेचैनी और कलीग
दिन 1 – सोमवार
सुबह 7 बजे,
बस और मेट्रो की भीड़,
पैरों में धक्का,
चेहरे थके हुए, आवाज़ें ऊँची।
ऑफिस पहुँचा
फाइलों की ढेर, बॉस की गालियाँ,
पर उसकी एक मुस्कान
खूबसूरत कलीग की,
मन को जैसे हँसी का झोंका मिला।
रात को घर लौटते हुए
भीड़ और थकान के बीच,
मन में हल्की बेचैनी,
और उसका चेहरा बार-बार याद आया।
दिन 2 – मंगलवार
मेल और फोन की बारिश,
सहकर्मी बातें कर रहे थे,
बॉस की डाँट लगातार।
पर बीच-बीच में उसकी हँसी,
जैसे कोई ताज़ा हवा।
मन बार-बार उसकी तरफ़ खिंचता।
रात में सोचता हूँ
“क्यों एक मुस्कान इतना असर करती है?”
दिन 3 – बुधवार
मीटिंग के दौरान,
उसकी आवाज़ कानों में गूँज गई।
भीड़, कागज़, कम्प्यूटर स्क्रीन
सब अचानक फीके।
दोपहर की चाय में थोड़ी बातचीत,
मन में हल्की हलचल,
बेचैनी थोड़ी कम,
दिल थोड़ा हल्का।
दिन 4 – गुरुवार
काम का बोझ भारी,
फाइलों का पहाड़,
पर उसकी मौजूदगी ने
दिन को रोशन कर दिया।
हर नजर उसी पर जाती,
उसकी मुस्कान, उसकी बातें
मन में हल्की लहर बन गई।
रात को घर लौटते हुए
सोचा—
“शायद यही सप्ताह की सबसे अच्छी चीज़ थी।”
दिन 5 – शुक्रवार
बॉस की गालियाँ,
सहकर्मियों की हल्की झलकियाँ,
सब पीछे रह गए
जब उसने पास से गुजरते हुए
हल्का मुस्कराया।
मन में हल्की धड़कन,
थकान कम हुई।
रात को नींद में भी
उसकी मुस्कान का झिलमिलापन।
दिन 6 – शनिवार
ऑफिस हल्का था,
पर मन भारी।
फिर भी उसकी उपस्थिति ने
दिन को रंगीन बना दिया।
कंप्यूटर स्क्रीन और फाइलों के बीच
मन बार-बार
उसकी बातें याद करता रहा।
रात को सोते समय
एक नज़्म उसके लिए बनी
“खूबसूरत कलीग की मुस्कान।”
दिन 7 – रविवार
सप्ताह का अंत,
मन थोड़ा शांत।
भीड़, मीटिंग्स, बॉस की आवाज़
सब पीछे रह गए।
खूबसूरत कलीग अब स्मृति में,
पर उसकी मुस्कान ने
मेरे सप्ताह में हल्की ताज़गी भरी।
सोते समय मन बोला
“अगला सप्ताह फिर उसकी मुस्कान की तलाश में आएगा।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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