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Sunday, 22 February 2026

डायरी : बेचैनी के सात दिन

 डायरी : बेचैनी के सात दिन


दिन 1 – सोमवार


सुबह उठी, आँखों में नींद की परतें,

लेकिन मन बेचैन, खामोश और घबराया।

रास्तों की हलचल,

भीड़ में खोया मैं,

हर चेहरा पर सवाल,

क्या मैं सही दिशा में हूँ?


दोपहर आई—कागज़ों की ढेर,

संपर्क के फोन,

बॉस की आवाज़ की गूँज।

मन कहता—

“क्यों इतना भाग रहा हूँ?”

पर जवाब कोई नहीं।


रात आई

पड़ती चादर, बुझती रोशनी,

और मन में

एक खालीपन की नज़्म।


दिन 2 – मंगलवार


धूप खिड़की से टकराई,

पर मन की अँधेरा नहीं गया।

चाय का प्याला हाथ में,

पर स्वाद खो गया।

आसपास लोग, बातें, हँसी,

पर मन कहीं और।


काम के बीच

छोटी-छोटी बातें,

पर मन फिर भी बेचैन।

रात को सोते समय

सपनों में भी

कागज़ और मीटिंग्स का भँवर।


दिन 3 – बुधवार


आज रास्ते में भिखारी दिखा।

उसकी आँखों में कुछ अनकहा।

जैसे वो मेरे अंदर की बेचैनी को पढ़ रहा हो।

दिनभर उसकी छवि मन में घूमती रही।

शायद वह मेरी अनकही पीड़ा का आईना था।


रात आई

सन्नाटा, और चाय का स्वाद फीका।

मन कह रहा था

“कहाँ खो गया हूँ मैं?”


दिन 4 – गुरुवार


फोन की घंटी, मेल का अलर्ट,

पर मन कहीं और।

बीते हुए कल की यादें,

भविष्य का डर।

समय तेज़ी से गुजरता,

पर मैं स्थिर हूँ,

बेचैनी में उलझा हुआ।


रात की चादर में,

एक हल्की सिहरन—

शायद यह बेचैनी

मेरे भीतर की आवाज़ थी।


दिन 5 – शुक्रवार


काम की ढेर सारी जिम्मेदारियाँ,

लोगों की उम्मीदें,

और मैं

सबको खुश करने की कोशिश में खुद खो गया।


लंच ब्रेक में

कागज़ के टुकड़े देखे,

मन में एक सवाल:

“क्या यह सब सही है?”

रात को नींद में भी

मन बेचैन,

सपनों में मीटिंग्स का सिलसिला।


दिन 6 – शनिवार


धूप और छाँव के बीच,

मन हल्का और भारी।

सपनों की उम्मीदें,

पर असली दुनिया भारी।

मन कहता

“थोड़ा ठहरो, थोड़ा सांस लो।”


रास्ते, लोग, बातें—

सब एक धुंधली छाया।

फिर भी,

मन में एक हल्की किरण

शायद आने वाले कल की उम्मीद।


दिन 7 – रविवार


सुबह उठी,

और पता चला

सप्ताह भर की बेचैनी

एक कहानी बन गई।


भीड़, धक्का, मीटिंग्स,

खालीपन और सवाल—

सब अब एक नज़्म की तरह

मन में गूँज रहे थे।


रात को सोते समय

मन बोला

“शायद अगला सप्ताह

बेचैनी से भी कुछ सिखाएगा।”

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