कम्बल और पति–पत्नी
कम्बल की चादर में छुपे दो दिल,
नरम-नरम सांसों की सिलसिला।
पति कहे – “थोड़ा सा मोड़ दो ज़रा,”
पत्नी मुस्कुराए – “ये हिस्सा मेरा।”
रात की ख़ामोशी में लिपटी हँसी,
कम्बल की जंग में छुपा प्यार का गीत।
“ये कोना मेरा, वो किनारा तेरा,”
हर करवट में नज़र आए अद्भुत मीत।
चाँद भी झुकता देख उनके खेल को,
सितारों ने भी ठहरी निगाहें।
सुबह जब सूरज ने बाँधा सुनहरा धागा,
कम्बल टूटा, पर मोहब्बत न घुटी।
हँसी और झगड़े की ये नाज़ुक बुनाई,
हर पल में छुपा शफ़क़त का रंग।
नई चादर ले लें या पुरानी ही सही,
उनके दिलों की गर्मी रहे हमेशा संग।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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