मैं उसे याद करता रहा,
हर साँस में उसका नाम लिया,
हर खामोशी में उसकी हँसी खोजता रहा,
हर धड़कन में उसका कदम महसूस किया।
और वो…
चुपचाप मुझे भूलने की कोशिश करती रही,
जैसे कोई नदी अपनी लहरें पीछे छोड़ दे,
जैसे कोई मौसम धीरे-धीरे अपनी खुशबू बदल दे।
रात के सन्नाटे में,
मैंने उसका साया अपने सामने देखा,
पर जब मैं हाथ बढ़ाता,
वो धुंध की तरह फिसल जाती।
दिन का उजाला भी मुझे ढूँढ नहीं पाया,
सूरज की पहली किरण भी मेरे दिल को नहीं छू पाई।
मैंने हर जगह उसे तलाशा —
भीड़ में, हवा में, बारिश में,
पर उसकी मुस्कान केवल मेरी यादों में थी।
मेरी तन्हाई ने मुझसे पूछा,
“क्या वो कभी लौटेगी?”
मैंने सिर झुकाया और चुप रह गया,
क्योंकि जवाब में केवल उसका नाम था,
जो मेरी रूह में गहराई तक गूँजता रहा।
और इसी याद में मैंने अपनी रातें बिताईं,
जैसे कोई पुराना ग़म अपनी खामोशी में बसा हो,
और मैं, हर पल उसकी परछाई के पीछे,
धीरे-धीरे खोता गया,
लेकिन उसे भूलने की उसकी कोशिश
कभी मेरे दिल से दूर नहीं हो सकी।
मुकेश ,,,,,,,,
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