रात के अँधेरे में बिछ गई कुछ हल्की-सी रौशनी,
परछाइयाँ आईं, बैठीं जैसे कोई ख़ामोश महफ़िल।
दीवारों पे नाचते, खिड़कियों में छुपते,
कुछ हँसी लिए, कुछ बातें लिए।
मैंने देखा उन्हें चुपचाप गुनगुनाते,
बीती यादों का संगीत सुनाते।
हर परछाई में एक नाम, हर साया में इक लम्हा,
महफ़िल रही मेरी, मेरी रूह की, मेरी यादों का।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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