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Monday, 23 February 2026

ठहरी हुई शाम आई, धीरे-धीरे कदम रख कर,

 ठहरी हुई शाम आई, धीरे-धीरे कदम रख कर,

सन्नाटे ने कानों में फुसफुसाई इक रहस्य भरी बात कर।


पेड़ों की पत्तियाँ हिलीं, मगर हवा भी सुनसान थी,

जैसे कोई पुराना ख़्वाब अब आँखों में उतर आया।


छत पर खड़ा मैं, खामोशी से बातें कर रहा,

दिल की दीवारों में भी तेरी परछाई उतर आई।


शहर की हलचल पीछे रह गई, समय भी थम सा गया,

ठहरी हुई शाम ने मेरी रूह को अपने आँचल में समेट लिया।


हर लम्हा ठहर गया, हर साँस में इक गीत बज उठा,

और मैं समझ गया — कुछ पल बस हमारी अपनी याद में रहते हैं।


नीला आसमान, सुनहरी डोर, ये शाम भी कुछ कह रही थी,

“जो ठहरता है दिल में, वही असली प्यार की पहचान होती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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