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Monday, 23 February 2026

नींद से पहले का ख़्याल

 नींद से पहले का ख़्याल


रात यूँ दिल पे उतरती है कि जैसे कोई आह,

और ख़ामोशी में जल उठती है यादों की निगाह।


दिन का कोलाहल थमा तो लगा, कुछ कमी सी है,

कोई लम्हा है जो सीने में अभी तक थमी सी है।


तकिये पर सर रखूँ तो तेरी सदा आती है,

जैसे वीरान गली में कोई रौशनी जाती है।


नींद की ओट में भी दिल को करार आता नहीं,

तेरा ख़्याल है कि जाता है, मगर जाता नहीं।


सुबह की धूप भी पूछे कि ये कैसी तन्हाई थी,

रात भर किससे मिरी रूह की रुसवाई थी।


नींद से पहले का वो पल, वो नर्म सा इक एहसास 

ज़िन्दगी से भी ज़्यादा था, और फिर भी था उदास


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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