नींद से पहले का ख़्याल
रात यूँ दिल पे उतरती है कि जैसे कोई आह,
और ख़ामोशी में जल उठती है यादों की निगाह।
दिन का कोलाहल थमा तो लगा, कुछ कमी सी है,
कोई लम्हा है जो सीने में अभी तक थमी सी है।
तकिये पर सर रखूँ तो तेरी सदा आती है,
जैसे वीरान गली में कोई रौशनी जाती है।
नींद की ओट में भी दिल को करार आता नहीं,
तेरा ख़्याल है कि जाता है, मगर जाता नहीं।
सुबह की धूप भी पूछे कि ये कैसी तन्हाई थी,
रात भर किससे मिरी रूह की रुसवाई थी।
नींद से पहले का वो पल, वो नर्म सा इक एहसास
ज़िन्दगी से भी ज़्यादा था, और फिर भी था उदास
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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