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Monday, 23 February 2026

ख़ामोशी की गुफ़्तगू

 ख़ामोशी की गुफ़्तगू

अल्फ़ाज़ों से बात करना अच्छा लगता है,

वे सहारा देते हैं,

रूह को खोल देते हैं,

पर सच तो यह है

ख़ामोशी ज़्यादा बोलती है।

ख़ामोशी में छिपे हैं

वो सवाल जो जुबां पर नहीं आते,

वो दर्द जिन्हें आँखें भी छू नहीं पातीं,

और वो सच्चाइयाँ

जिन्हें अल्फ़ाज़ अक्सर ढक लेते हैं।

मैं कई बार चाहता हूँ

कि इस ख़ामोशी में डूब जाऊँ,

जहाँ कोई जवाब न हो,

सिर्फ़ रूह का आईना हो।

आजकल मैं उसी आईने में डूबा हुआ हूँ

जहाँ मैं हूँ,

और मेरी ख़ामोशी

मेरी सबसे सच्ची गुफ़्तगू बन गई है।


मुकेश ,,,


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