सिगरेट की राख में वो औरत
(एक अकेले मर्द की रात की तासीर)
हर रात की तरह
आज भी मैंने सिगरेट जलाई
धुआँ धीरे-धीरे कमरे की छत तक चढ़ा
जैसे उसके आँचल की महक
मेरे सीने से होकर हवा में घुल जाती थी।
राख जब ऐशट्रे में गिरती है,
तो मुझे उसकी पलकें याद आती हैं
जो मेरे हर झूठ पर झपकती थीं
जैसे मान लेना ही उसका इश्क़ था।
मैं जानता हूँ,
वो कोई ख़ास औरत नहीं थी
पर हर बार जब सिगरेट का आख़िरी कश लेता हूँ
उसका चेहरा धुएँ में उभर आता है
नज़रों से नहीं,
यादों की उन सिलवटों से
जहाँ अब भी उसकी हँसी दबी है।
उसकी बातें
जैसे पुराने होठों की पपड़ी
छूटती नहीं,
बस जलती हैं, राख बनती हैं
और फिर लौट आती हैं
हर रात, मेरी उंगलियों में
एक और सिगरेट की तरह।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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