रीतिकालीन
शैली में राधा–कृष्ण संवाद
(प्रातःकाल का ब्रज दृश्य)
दृश्य-भूमिका :
प्रातः बेला की लाली
पूर्व दिशा में झलक
रही है।
कुंजों में कलियाँ अलसाई
सी मुस्कान लिए जाग रही
हैं,
भौरें गुनगुनाते हैं — “श्याम आया, श्याम आया।”
यमुना के जल पर
सुनहरी आभा नाच उठी
है।
गोपिकाएँ घड़े सिर पर
रखे, राधा–कृष्ण की
याद में गीत गुनगुनातीं
चलीं जा रही हैं।
(कृष्ण
राधा के कक्ष के निकट पहुँचते हैं)
कृष्ण
(मृदुल स्वर में मुस्कुराते
हुए):
उठो
राधे! दिनकर हँसि उठा,
कुंज कुंज बासों मधुप
गुंज उठा।
देखो ब्रज की गलिन
में आज,
बसंत बहार फिर से
नूतन नाच उठा।
गौएँ
थानों में रम्भा उठीं,
ग्वाल संग बंसी तान
उठी।
और तुम अब भी
निद्रा मग्न —
क्या स्वप्नों में भी मुझसे
रास रच रही हो?
(राधा
हलकी मुस्कान सहित करवट लेती हैं)
राधा
(अधखुले नेत्रों से):
प्रिय
मोहन! तव वंशी की
तान,
स्वप्न में भी मन
मोहित करि गई।
मैं जागूं कैसे, जब निद्रा में
भी
तेरे ही रूप की
छवि छा गई।
अधरों
पे जो हँसी है
अब,
वह स्वप्न न, तेरे नाम
की छाँह है।
जगा तो दूँ मैं
नेत्र आज,
पर डर है, न
टूटे यह प्रेम की
बाँह है।
(कृष्ण
पास झुकते हैं, उनकी आँखों में चपलता झिलमिला उठती है)
कृष्ण:
राधे!
यह भोर की बेला,
जैसे तेरे मुख की
आभा का आलोक हो।
उठो चलें कालिंदी तट,
जहाँ पवन भी तेरे
कुंतल चूमने को व्याकुल हो।
देखो,
मुरली मेरी आतुर है,
तेरे चरण संग ताल
मिलाने को।
ब्रज की हर बयार
पुकारे,
राधे! चलो श्याम संग
रास में रमने को।
(राधा
धीरे से उठ बैठती हैं, केश बिखरे, मुख पर लाली)
राधा
(लज्जा से किंतु प्रेमिल
स्वर में):
श्याम!
तेरे वचन मधुर सुघर,
मन को चितवन की
बाँसुरी बने।
चलूँ तेरे संग कालिंदी
तट,
जहाँ नयनों का रास पुन्हा
सजे।
यह कुंतल सँवारूँ, या तेरी ओर
निहारूँ?
यह लाज छिपाऊँ या
तेरे मन में उतारूँ?
तू ही कह दे,
मुरलीधर,
आज कौन सी लय
में हृदय को धारूँ?
(कृष्ण
मुस्कुराते हैं, राधा का हाथ थामते हैं)
कृष्ण:
छोड़ो
लाज की परतें, राधे!
यह भोर भी तेरे
संग रंगे।
चलो, बृज की गलियों
में गूँज उठे,
‘श्याम–राधे’ के नाम के
संग रँग।
मैं
बांसुरी छेड़ूँ एक तान,
और ब्रज की धरा
गगन गान।
तव पग पायल बोले
रागिनी,
यमुना लहरों में पड़े झंकार।
(दोनों
हाथों में हाथ लिए कालिंदी कुंज की ओर बढ़ते हैं)
गोपियाँ
पीछे गा उठती हैं –
“राधे
श्याम संग ब्रज में
निकसे,
कुंज कुंज सौरभ बिखरे।
पावन हुई यह प्रात
बेला,
जब नयन रास के
रस से निकसे।”
(कृष्ण
बंसी बजाते हैं, राधा नृत्य की मुद्रा में झूम उठती हैं, बृज में रास प्रारंभ होता है)
बृज
भू पर प्रेम की
गंगा बहे,
राधे-श्याम के नयन मिलन
कहे।
जहाँ तान से तृप्त
हुआ सारा ब्रह्मांड,
वहीँ प्रेम हुआ — स्वयं परम ब्रह्म का
प्रमान।
राधा–कृष्ण संवाद (सवैया शैली में)
(प्रातःकालीन
ब्रज दृश्य — कालिंदी कुंज की ओर)
[दृश्य:
प्रातः का ब्रज, सूरज की सुनहरी लाली, मंद बयार, राधा निद्रा में, कान्हा समीप आते हैं]
कृष्ण
(मंद हँसि कर):
उठ राधे! दिनकर उगि आयो, झलक्यो
अंबर में अरुण उजास।
गुँजत भौंरा मधुप रसभरे, खिलत
कुसुमन पर छायो प्रकाश।
गोपी गमन करैं जल
भरन, गौंवन ग्वाल सब भए उदास।
तैं सोवत क्यों सुघरि
प्यारी, उठि देख जरा
यह ब्रज विकास॥
(राधा
करवट लेती हैं, अधखुले नयन, अधरों पे स्वप्न की मुस्कान)
राधा
(नींद भरे स्वर में):
प्रिय
मोहन! तोहि बिन ब्रज
सूना, स्वप्नन में भी तोहि
देखत नित।
सुनि बंसी तान जागत
मन, पल में हरि
जाई नींद समित।
यह लोचन खोले कैसे
अब, डर लागे टूटि
न प्रेम पथित।
रहन दे मोहन, निद्रा
सुख, यह सपन सजीव
समरस अमित॥
कृष्ण
(चपल मुस्कान सहित):
भोली
राधे! स्वप्न न यह, जागी
ब्रज में प्रीत अनूप।
चल कालिंदी तट संग चलैं,
जहाँ पवनन में प्रेम
रूप।
देखो बकुल डारन पर
बँध्यो, मधुकर जैसा मन मकरंदकूप।
मैं गाऊँ बंसी सखि,
तू नाचि, उठि रंगि दे
जग सारा रूप॥
(राधा
लज्जा से उठतीं, केश सँवारतीं, मुख पर भोर की छवि)
राधा:
कहौं
सखि मोहन, लाज कछु लागै,
कैसे चलौं तव संग
निकट?
अधरों पर मुस्कान फिरी,
मन रच्यो तेरी बाँसुरी पट।
यह कुंतल बाँधौं या निहारौं, यह
चित लजावौं या धर कटि?
कहि दे कान्हा, आज
करौं क्या — मिलन करौं, कि
रहौं सखि रट॥
कृष्ण
(प्रेमभरी दृष्टि से):
छोड़ि
दे राधे लाज विकल,
यह प्रात पुनीत, यह दिवस अमान।
चल संग मेरे कालिंदी
कूल, जिहँ गोप सुहागिन
करें गान।
तव पग पायल झनक
रही, मैं छेड़ूँ बंसी,
नाचै गगन।
चलो, ब्रज भूमि कहे
हर्षित — “श्याम–राधे! सजीव मधुर मिलन॥”
[दोनों
हाथों में हाथ धर कालिंदी की ओर बढ़ते हैं —]
चल्यो
श्याम संग राधा रूपी,
सौरभ भर्यो सुघर कुंज निकेत।
गोपी गावत रास रसीले,
गूँज्यो ब्रज, झूम्यो प्रेम स्नेह।
तव नेत्रन में नृत्य सजी,
तव हासन में बिखर्यो
देव अचेत।
राधे–श्याम मिलन की बेला,
भयो ब्रजमंडल स्वर्ग सम क्षेत्र॥
समाप्त — ‘रासारंभ’ दृश्य
दृश्य
द्वितीय – रासारंभ (कालिंदी तट पर)
(सवैया
और हरिगीतिका छंदों में)
[दृश्य
– कालिंदी कुंज :
सुबह की सुनहरी किरणें
यमुना के जल पर
झिलमिलातीं।
कान्हा की मुरली की
तान में पवन भी
नाच उठता है।
राधा संग ब्रज की
गोपियाँ एक-एक कर
कुंज में पहुँचती हैं।]**
कृष्ण
(बंसी मुख लगाते हुए):
सुनो
सखियो! यह रस की
बेला,
आज विरह सब भूल
चलो।
कालिंदी के तट पर
हँसते,
प्रीत-सुधा में फूल
चलो॥
देखो
नभ में सूरज चूमे,
राधा के मुख का
माधुर्य रंग।
मैं मुरली धर, तुम पग
थिरको,
झूम उठे यह ब्रज
तरंग॥
(गोपिकाएँ
समूह में गातीं):
जय श्याम सुंदर! जय नंदलाल!
तव छवि देखि, भयो
हिय निहाल।
राधा
संग नाचत मधुप सुरे,
रास रच्यो ब्रजमंडल भाल॥
राधा
(स्मित सहित, नेत्रों में लाज और प्रेम का समर मिश्रित):
कान्हा!
अब न छेड़ो इतनी
मुरली,
यह हृदय सम्हालत नाहीं।
तव स्वर झरे अमृत
सरिसा,
यह देह तरंग उठी
जाहीं॥
सखियाँ
कहत सब, “राधे! नाचो!”
मन थिर रहत नाहीं,
चरण फिसलत।
तव नेह की लहर
उठी यमुना सी,
चेतन रहत न, नयन
मचलत॥
कृष्ण
(मंद हँसि कर):
राधे!
प्रेम बाढ़ै बहुतेरी,
यह रस न शब्दन
में आवै।
नाचो
संग मेरो हरि रस
में,
जिहँ प्राण प्रीत बनि जावै॥
यह रास न मर्त्य
देखि सकै,
यह रास तो ब्रह्म
समावै।
जहाँ
आत्मा और परमात्मा,
एक-दूसरे में विलसि जावै॥
(सवैया
छंद — रास का आरंभ)
झूमीं
गोपी तन लचक लिए,
गगन हिल्यो तव प्रेम घनघोर।
राधा नाचत मधुप सरीखी,
पग छूवत भूधर की
डोर।
कान्हा बंसी में जादू
भरे, बन्यो संगीत स्वयं सिरमौर।
धरा गगन सब रास
मगन, जनु ब्रह्म नृत्य
भयो मृदु-डोर॥
(हरिगीतिका
— ब्रह्म रास का वर्णन)
मधुर
मुरली की तान चली,
बन में उठी तरंग।
झूमी राधा, झूमी सखियाँ, नाच्यो
ब्रज अनंग॥
तव नयनन में दीप
जले, तव हास समीर
प्राण।
जहाँ प्रेम का सागर उमगा,
तहाँ मिट्यो सब मान॥
नाच्यो
श्याम स्वयं शिव स्वरूप, राधा
लास्य अपार।
ब्रह्म तत्त्व उस रास में
उतरा, बन्यो सृष्टि आधार॥
(अंतिम
सवैया — समापन दृश्य)
बृज
बन्यो आज प्रेम धाम,
जहाँ न राग, न
द्वेष रही।
सब संग लपट्यो श्याम
समे, न चेत रही,
न देह रही।
राधा श्याम मिले रस रूप,
न शब्द रही, न
लेख रही।
ब्रह्म कह्यो — "यह रास परम,
जिहँ जीव और हरि
एक रही॥"
समाप्त
— रासारंभ दृश्य 🌷
दृश्य
तृतीय — रास के उपरांत : राधा का अंतर्मन संवाद
(रीतिकालीन
नाट्य-काव्य रूप में)
[दृश्य
: रास समाप्त हुआ है — यमुना तट शांत है, चाँदनी झिलमिलाती है।
गोपिकाएँ थकी हुई प्रेम में डूबी बैठी हैं।
कृष्ण मौन हैं — और राधा की आँखें ध्यानमग्न।
उनके अधरों पर हल्की मुस्कान — जैसे आत्मा ब्रह्म से बात कर रही हो।]
(राधा
– एकांत में स्वयं से):
सब नाच थम्यो, सब
स्वर रुक्यो,
पर मन में राग
अधूरो है।
श्याम मिले तन से
तो सहीं,
पर मन का मिलन
न पूरा है॥
(सवैया
छंद — आत्मानुभूति की पहली लहर)
चुप
भयो कुंज, न गान सुन्यो,
बस श्वास रहीं राधा की
तान।
चित में कान्हा की
छवि समाई, जनु प्राण गयो
हरि के पास समान।
यह देह, यह रूप,
यह रास सखि, सब
भास भयो मिथ्या ज्ञान।
अब तो हरि ही
मैं बन बैठी, मिट्यो
भेद — 'मैं' और 'श्याम'॥
(हरिगीतिका
— ध्यान की स्थिति)
नयनन
में वह श्याम समायो,
हिय में उनका रूप।
रह्यो न राधा, रह्यो
न कान्हा,
बस प्रेम भयो स्वरूप॥
गंध
बनी, गगन समाई,
बूँद बनी बन सागर।
राधा खोई, हरि मिल
गए,
मिटि गई ‘मैं’ की
डगर॥
(राधा
का मौन स्वर आत्मा से):
हे श्याम! अब तू मैं,
मैं तू —
यह भेद कहाँ रह
पायो?
यह रास नृत्य न
दो तनन का,
यह नृत्य आत्मा का आयो॥
जहाँ
नाम नहीं, न रूप रहे,
न स्पर्श, न राग, न
द्वेष।
वहाँ बस तू ही
तू बचे,
और प्रेम स्वयं परिवेश॥
(दोहा
— अद्वैत बोध)
राधा
खोजत कान्ह को, कान्हा खोजत
राध।
खोजत खोजत मिट गए,
रह्यो एक रस साध॥
(सवैया
— समाधि अवस्था)
तन थिर भयो, मन
हरि में विलस, नयनन
में ज्योति समुद्र समाय।
शब्द मरे, स्वर मौन
भए, बस हृदय ध्वनि
हरि नाम सुनाय।
यह राधा अब देह
न सखि, यह श्याम
रसों में प्राण बसाय।
ब्रह्म कह्यो — यह रास न
लीला, यह मोक्ष का
स्वयं स्वरूप कहाय॥
(हरिगीतिका
— अंतिम मिलन)
यमुना
बहै मंद स्वर गावत,
लहरिन में ध्यान डोल।
ब्रह्म बसी राधा की
नैनन में,
प्रेम भयो अनमोल॥
कान्हा
मौन रहे, राधा मौन,
पर मन बोले शुद्ध।
जहाँ शब्द मौन हो
जाएँ,
वहाँ परम सत्य प्रदीप्त॥
(समापन
दोहा)
रास
नृत्य का अंत यह,
प्रारंभ अनंत समाय।
जहाँ राधा श्याम एक
हैं, वहाँ सत्य स्वयं
झलकाय॥
समाप्त — राधा का आत्मसंवाद दृश्य
दृश्य चतुर्थ — चेतन प्रभात (प्रेम का योग)
(रीतिकालीन
नाट्य-काव्य शैली में)
[दृश्य
:
कालिंदी तट पर रात
ढल चुकी है,
राधा समाधि में हैं — मुख
पर तेज, नेत्र बंद।
कृष्ण शांत ध्यान मुद्रा
में बैठकर राधा को निहार
रहे हैं।
पूर्व दिशा से उषा
का प्रथम किरण झाँकता है।]**
(कृष्ण,
मन में):
यह कौन समाधि की
छवि, यह कौन निरंजन
रूप?
यह राधा न अब
केवल प्रेयसी,
यह स्वयं ब्रह्म की ध्वनि स्वरूप॥
देखो!
श्वासें मंद हुईं,
किन्तु मुख पर चंद्रकांत
ज्वाल।
यह देह ज्यों दीपक
बुझता,
पर भीतर अग्नि है
दिव्य विशाल॥
(सवैया
— कृष्ण का भावोद्गार)
झुक्यो
श्याम चरणन राधा के,
देख्यो मुख उजियार अनूप।
यह देह नहीं अब
देह रही, यह प्रेम
बन्यो ब्रह्म स्वरूप।
हरि बोले — “राधे! खोल नयन, यह
जग देख तव योग
धूप।
तव प्रेम में मोहे हरि
मिले, अब ज्ञान भयो
यह प्रेम रूप॥”
(राधा
धीरे-धीरे नेत्र खोलती हैं)
कान्हा!
यह कौन भोर की
लाली,
यह कौन नई उषा
आई?
यमुना
स्थिर, कुंज सजीव,
यह कैसी सुधा बरसाई?
देखो
श्याम! यह जग भी
अब,
तेरे रूप में दीखत
है।
हर पवन, हर रश्मि,
हर छवि,
मन में तेरा संगीत
बजत है॥
(हरिगीतिका
— पुनर्जागरण का गीत)
उषा
की किरन हँसत आई,
कुंज में गुँज्यो राग।
प्रेम समाधि से उठी राधा,
जीवन बन्यो अनुराग॥
श्याम
ने झुक कर छूए
चरण,
कहा — “तू मोहि समाई।
अब प्रेम तव योग कहाय,
यह शक्ति अमर पर आई॥”
(कृष्ण
का उपदेश – सवैया)
हरि
बोले — “राधे! यह रास नहीं,
यह योग गूढ़ रहस्य।
जहाँ प्रेम उपजै निःस्वार्थ, वहाँ
मिटै सकल कलह व्यस।
तू साधक, मैं साध्य तव,
यह खेल दिव्य, यह
प्रेम वश।
न तूं स्त्री, न
मैं पुरुष, हम एक ब्रह्म
का प्रेम अवश॥”
(राधा
का उत्तर – ब्रह्मानुभूति स्वर में):
हाँ
मोहन! अब जानि गई,
प्रेम न पथिक, न
राह।
यह तो आत्मा का
नर्तन है,
जहाँ मिटै सारा चाह॥
मैं
तू बनि, तू मैं
बन्यो,
यह लीला नयनो पार।
प्रेम स्वयं परब्रह्म कह्यो,
यह रास जगत आधार॥
(दोहा
– निष्कर्ष)
रास
न केवल नृत्य है,
न केवल राग-सुरंग।
यह तो आत्मा–परमात्मा
का, एक अनंत प्रसंग॥
(हरिगीतिका
– समापन)
भोर
की बेला हँस उठी,
कुंज महक्यो आज।
ब्रज धरा गावत प्रेम
गीत,
बह्यो सुधा-सनेह समाज॥
यमुना
बही मृदु मंद गगन,
तट पर दीप जले।
राधा–श्याम एक रूप भए,
जग प्रेम में पले॥
(सवैया
– अंतिम वचन)
अब ब्रज भू पर
नाच उठ्यो, नव जीवन, नव
प्रकाश।
जहाँ राधा हिय में
श्याम बसे, वहीं हरि
का निवास।
ब्रह्म कह्यो — “यह प्रेम सरीखा,
न ज्ञान, न कर्म, न
त्रास।”
यही राधा–श्याम कथा
सनातन — प्रेम अनादि विलास॥
समाप्त
— “रास से समाधि, समाधि से सृष्टि” : चेतन प्रभात दृश्य 🌸
रास पंचाध्यायी – रूपरेखा
(संक्षेप
में भावभूमि का परिचय — व्रज
की रात्रि, राधा–कृष्ण का
मिलन, रास की प्रतीकात्मक
व्याख्या: आत्मा और परमात्मा का
संवाद।)
प्रथम
अध्याय – प्रातः दृश्य (जागरण लीला)
सवैया
छंदों में संवाद:
- सखी का राधा से संवाद — “निशा गई, उठो प्रिये!”
- राधा की नींद और मन के द्वंद्व
- अंत में कृष्ण का स्मरण और चेतना का जागरण
द्वितीय
अध्याय – रासारंभ (मध्यम रात्रि)
छंदबद्ध
वार्ता:
- बाँसुरी की ध्वनि और गोपियों का आगमन
- कृष्ण का ललित आमंत्रण
- राधा की मर्ममयी शंका – “प्रेम मेरा या रास तेरा?”
- कृष्ण का उत्तर – “जहाँ रास, वहाँ रस का अधिपति कौन?”
तृतीय
अध्याय – राधा–अंतर्मन संवाद (आत्मरास)
सवैया
व कवित्त मिश्रित छंद:
- राधा का आत्मदर्शन
- “कृष्ण मुझमें हैं या मैं उनमें?”
- मन, बुद्धि, चित्, अहं का संवाद (जैसे आत्मसंवाद–नाट्य रूप)
चतुर्थ
अध्याय – चेतन प्रभात (प्रभात वेला)
- राधा का समाधिस्थ होना
- सखियाँ चकित – “कृष्ण कहाँ हैं?”
- उत्तर – “वो राधा में हैं।”
- रूपांतरण का रहस्य: राधा का कृष्णमय हो जाना
पंचम
अध्याय – समर्पण रास (निष्कर्ष)
- राधा का वाक्य: “अब न मैं हूँ, न तू — बस रसस्वरूप तू ही तू।”
- कृष्ण का आलिंगन और विलय —
- रस का चरमोत्कर्ष: अद्वैत भाव में एकत्व।
तत्त्वार्थ
(दार्शनिक व्याख्या)
(अंत
में, रीतिकालीन शैली में भावार्थ
और फिर आधुनिक व्याख्या
—
जैसे राधा = जीवात्मा, कृष्ण = परमात्मा, रास = आत्मा–परमात्मा का मिलन,
और “चेतन प्रभात” का
अर्थ — ज्ञान का उदय।)
संदर्भ
(भूमिका)
व्रज
की रात अर्धमुग्ध है।
चंद्र किरणें जमुना के जल पर
झिलमिला रही हैं।
कुंजों में मधुप गूंज
रहे हैं।
राधा निद्रा में हैं — अधरों
पर मंद मुस्कान, नेत्रों
में स्वप्नमय बाँसुरी की छवि।
सखी चंपकलता धीरे-धीरे उन्हें
जगाने आती है।
संवाद
(सवैया छंदों में)
(सखी
– चंपकलता)
जागो
राधे! अरुण अलसाए, नवदिन
लजिया उठो सखि प्यारी।
कंज नयनन में प्रेम
सुवास, अधरन पर मधुर
मुस्कान उभारी।
वृंदावन हँसि उठा सखि
देखो, कुंजन में रस की
रेख उजारी।
उठो सखि, कान्ह बुलावत
राधे, रसमय बंसी बजावत
नारी॥
(राधा
– निद्रामग्न स्वर में)
सखि!
कह मत मोहे जगावत
क्यों, मोहे स्वप्न सुधा
में डुबायो।
कान्ह सुरत रूप समीर
समो, यह देह सुधा
सों भी भुलायो।
बाँसुरि की तनु में
प्राण बसे, यह मृदु
मुरली मन हरि जायो।
कहो सखि, रैन भली
है अति — न जगाओ, सपन
सों मैं जावौं॥
(सखी
– चंपकलता)
राधे!
अब तन छबि अलस
अलोकी, नेत्रन में निशा के
नीर।
कान्हन के वन में
प्रेम पवन, गावत है
रस की तान अधीर।
जग मंगला करि उठो, सुहागिन!
हृदय जगे यह चित्त
गंभीर।
सृष्टि रचै रसलीला कान्ह
— अब क्यों राधा शिथिल शरीर?॥
(राधा
– अर्धचेतना में)
सखी!
न मैं तन में,
न जग में हूँ
— मैं रस में बहि
सी नीर।
कान्हन छवि मन में
संवरि रही, यह चेतन
हारी अधीर।
जो सोए, वह तो
राधा थी — अब जागी
रस की अधिर अधीर।
अब न जगाऊ, सखी,
अब तो — कृष्णहि भये मन, तन, नीर॥
(सखी
– भावविह्वल होकर)
हरि!
यह कैसी सुधा सुधाकर,
राधा सुधि सब बिसराय।
चित मानस सरिता बन
गई, जियँ कान्ह समाकर
जाय।
उठो प्रिये! अब प्रभात समीप,
अरुण रेखा नभ में
छाय।
देखो, ब्रज जागा, गोकुल
हँसा — राधा, रस में रमि
जाओ॥
दृश्यांत
(समापन)
राधा
धीरे-धीरे नेत्र खोलती
हैं।
उनकी आँखों में जग का
आलोक नहीं, कृष्ण का आलोक झलकता है।
वे उठती नहीं — बस
मौन मुस्कुराती हैं।
उनके अधरों पर एक वाक्य
फिसलता है —
“जो
जागा, वह मैं नहीं...
वही कान्ह जो मुझमें जागा
है…”
(पृष्ठभूमि
में बाँसुरी की धुन। मंद
प्रकाश। रास का आह्वान
प्रारंभ होता है।)
तत्त्वार्थ
(दार्शनिक व्याख्या)
यह
दृश्य आत्म-जागरण का प्रतीक है।
राधा का निद्रा से
जागना केवल भौतिक नहीं,
आध्यात्मिक चेतना का उदय है।
सखी (चित्त) आत्मा को जगाती है,
और आत्मा (राधा) जब ‘कृष्ण-स्मृति’
में विलीन होती है, तब
देह, मन और जग
सब भुला देती है।
यह “जागरण लीला” वास्तव में जीव से चेतन में आरोहण का प्रतीक है
—
जहाँ प्रेम ही ध्यान है,
और ध्यान ही ईश्वर का
मिलन।
रास पंचाध्यायी – द्वितीय अध्याय : रासारंभ (मध्यम रात्रि लीला) 🌕
(रीतिकालीन नाट्य-काव्य रूप — सवैया छंद और संवाद शैली में)
संदर्भ
(भूमिका)
प्रभात
की बेला बीत गई।
अब रात्रि की मधुर छाया
वृंदावन पर उतर आई
है।
कालिंदी के तट पर
दीपक झिलमिला रहे हैं, मंद
समीर में कदंब की
गंध बह रही है।
गोपियाँ सज-धजकर निकली
हैं — हृदय में एक
ही वासना,
“आज कृष्ण संग रास में मिलन हो।”
कान्ह बंसी लिए प्रकट
होते हैं, और सब
दिशाएँ मानो बाँसुरी की
तान में थम जाती
हैं।
संवाद
(सवैया छंदों में)
(कान्हा
– बंसी धारण कर)
सुनो
सखियन! आज रस रास
रचौं, जमुना तट कानन छाया।
चंपक गंध, शरद चाँदनी,
सब लजि देखत रूप
सुहाया।
प्रेम सुधा सों भरौं
हृदय सब, मन तृप्ति
रस सागर छाया।
आओ राधे! प्राण समर्पौं, अब ब्रज रस
में जग लहराया॥
(राधा
– मंद मुस्कान से)
कान्ह!
नयनन में तुम ही
बसे, तन मन सब
तुम पर अर्पी।
पर रास की रीत
विचित्र अति, भावन तरंग
नयन सों सरपी।
मन भय भरा — जग
देखि कहै, “कान्ह सों राधा क्यों
हरषी?”
पर प्रेम न मानै लाज
जगत की, रस में
डूबि सब सुधि हरषी॥
(कान्हा
– चितवन कर)
राधे!
जग लाज तहाँ होती,
जहाँ देह और मन
रहे।
यहाँ तो बस रस
की रचना, जहाँ मैं तुम,
दो न कहे।
यह प्रेम न देह, न
मान का — यह तो
आत्मा का बंधन।
जहाँ राधा मैं, मैं
राधा — यह रस नृपति
का वंदन॥
(गोपियाँ
– समवेत स्वर में)
हरि!
हम भी राधा के
संग चलें, रस की लहरन
में बहि जाएँ।
तुम बंसी की एक
तान छेड़ो, हम हृदय सुधा
में लहराएँ।
रास मंडल मधुप बनायो,
हम नयन सुमन बिछायें।
कृष्ण! आज बसो तन–मन में, यह
जीवन रास बनायें॥
(कान्हा
– बंसी उठा कर)
लो सखियो! अब बंसी बाजी,
अब तो रस की
गंध बही।
ब्रज की रज सुधा
में भीगी, हरि बृंदा कानन
हँसी रही।
नर्तन कर रस-मंडल
बनायो, सब दिशि माधुरी
सजी।
जहाँ राधा हृदय समर्पित,
वहाँ रस-परमात्मा वसि
रही॥
🌸 दृश्यांत (समापन)
बंसी
बज उठती है।
जमुना तट पर सौंदर्य
का महासागर उमड़ पड़ता है।
राधा और गोपियाँ वृत्ताकार
घूमती हैं, कान्हा हर
एक के साथ, फिर
भी एक ही।
समय, दिशा, रूप सब विलीन
हो जाते हैं —
केवल रस शेष रह जाता
है।
तत्त्वार्थ
(दार्शनिक व्याख्या)
यह दृश्य अद्वैत प्रेम का प्रतीक है।
जब आत्मा (राधा) और परमात्मा (कृष्ण)
के मध्य द्वैत मिट
जाता है, तब जो
लीला घटित होती है,
वह “रास” कहलाती है।
रास का अर्थ नृत्य
नहीं, — वह सृष्टि और चेतना का चक्र है,
जहाँ प्रत्येक जीव अपने ईश्वर
के चारों ओर परिक्रमा करता
है, और अंततः उसी
में लय हो जाता
है।
बाँसुरी का स्वर यहाँ
ओंकार की ध्वनि है —
जो ब्रह्मांड में सबको जोड़ती
है।
रास
पंचाध्यायी – तृतीय अध्याय : राधा का अंतर्मन संवाद (विरह और लय) 🌸
(रीतिकालीन नाट्य-काव्य रूप — सवैया और हरिगीतिका छंदों में)
संदर्भ
(भूमिका)
रास
समाप्त हो चुका है।
जमुना तट पर रात
की छाया गहरी है।
गोपियाँ थकी हुई हैं,
मद्धम रश्मियों में आनंदित।
कृष्ण शांत मुद्रा में
दूर बैठे हैं।
राधा अकेली — हृदय में विरह
की लय और अनंत प्रेम की अनुभूति।
यह क्षण आत्मा और
परमात्मा के बीच अदृश्य
संवाद का है।
संवाद
(सवैया और हरिगीतिका छंदों में)
(राधा
– अन्तर्मन में, चुपचाप)
सब नृत्य थम्यो, सब हास मुरझायो,
पर मन में प्रेम
की लहर बहायो।
कान्ह कहाँ, मैं कहाँ — भेद
मिट गयो,
यह रस न देह
में, न तन में
रहायो।
(सवैया
छंद – आत्मा का दर्शन)
चुप
भयो कुंज, न गान सुन्यो,
बस श्वास रहीं राधा की
तान।
चित में कान्हा की
छवि समाई, जनु प्राण गयो
हरि के पास समान।
यह देह, यह रूप,
यह रास सखि, सब
भास भयो मिथ्या ज्ञान।
अब तो हरि ही
मैं बन बैठी, मिट्यो
भेद — 'मैं' और 'श्याम'॥
(हरिगीतिका
– ध्यान की लहर)
नयनन
में वह श्याम समायो,
हिय में उनका रूप।
रह्यो न राधा, रह्यो
न कान्हा, बस प्रेम स्वयं
स्वरूप।
गंध बनी, गगन समाई,
बूँद बनी बन सागर।
राधा खोई, हरि मिल
गए, मिटि गई ‘मैं’
की डगर॥
(राधा
– मौन स्वर, आत्मा की अनुभूति में)
हे श्याम! अब तू मैं,
मैं तू —
यह भेद कहाँ रह
पायो?
यह रास नृत्य न
दो तनन का,
यह नृत्य आत्मा का आयो॥
जहाँ
नाम नहीं, न रूप रहे,
न स्पर्श, न राग, न
द्वेष।
वहाँ बस तू ही
तू बचे,
और प्रेम स्वयं परिवेश॥
(दोहा
– अद्वैत बोध)
राधा
खोजत कान्ह को, कान्हा खोजत
राध।
खोजत खोजत मिट गए,
रह्यो एक रस साध॥
(सवैया
– समाधि अवस्था)
तन थिर भयो, मन
हरि में विलस, नयनन
में ज्योति समुद्र समाय।
शब्द मरे, स्वर मौन
भए, बस हृदय ध्वनि
हरि नाम सुनाय।
यह राधा अब देह
न सखि, यह श्याम
रसों में प्राण बसाय।
ब्रह्म कह्यो — यह रास न
लीला, यह मोक्ष का
स्वयं स्वरूप कहाय॥
(हरिगीतिका
– अंतिम विलयन)
यमुना
बहै मंद स्वर गावत,
लहरिन में ध्यान डोल।
ब्रह्म बसी राधा की
नैनन में, प्रेम भयो
अनमोल।
कान्हा मौन रहे, राधा
मौन, पर मन बोले
शुद्ध।
जहाँ शब्द मौन हो
जाएँ, वहाँ परम सत्य
प्रदीप्त॥
तत्त्वार्थ
(दार्शनिक व्याख्या)
यह अध्याय विरह और आत्म-रस का संगम दर्शाता है।
रास समाप्ति के पश्चात राधा
अकेली रहकर अनुभव करती
हैं —
कि प्रेम केवल नृत्य, संगीत
या दृश्य नहीं;
वह आत्मा और परमात्मा का अद्वैत अनुभव है।
यहाँ ‘राधा’ और ‘कृष्ण’ नामक
भौतिक भेद मिट जाते
हैं,
और केवल रस स्वरूप प्रेम शेष रहता है।
यही वह अवस्था है
जहाँ जीव अपने अस्तित्व
को परम प्रेम में
विलीन कर देता है।
रास
पंचाध्यायी – चतुर्थ अध्याय : चेतन प्रभात (प्रभात वेला) 🌅
(रीतिकालीन नाट्य-काव्य रूप — सवैया, हरिगीतिका, और दोहा मिश्रित)
संदर्भ
(भूमिका)
रास
और अंतर्मन संवाद के बाद।
राधा समाधि में हैं, कान्हा
ध्यान मुद्रा में।
पूर्व दिशा से प्रातः
किरणें झाँक रही हैं।
कुंज, यमुना तट और वृंदावन
में सभी वस्तुएँ शांत
हैं।
यह क्षण चेतना का
उदय है — आत्मा और परमात्मा का मिलन प्रकाशित होता है।
संवाद
(सवैया, हरिगीतिका छंदों में)
(कृष्ण
– शांति पूर्वक)
देखो
राधे! अब तू जागी,
पर जागरण केवल देह का
न हो।
यह चेतन प्रभात है,
जहाँ रस ही ज्ञान
है,
और प्रेम ही परम योग
का स्वरूप हो।
(राधा
– नेत्र खोलते हुए, धीरे-धीरे मुस्कान के साथ)
कान्ह!
यह भोर की लाली,
यह प्रभात की हल्की रश्मि,
जग हँसता है, पर मैं
देखती हूँ केवल तेरा
रूप।
तन, मन, आत्मा — सब
तुझमें विलीन हो गए।
(सवैया
– कृष्ण का उपदेश)
देखो
राधे! यह रास न
केवल नृत्य है, न केवल
भावन।
यह आत्मा–परमात्मा का योग,
जहाँ मैं तू, तू
मैं — भेद मिट गया।
यही प्रेम का चरमोत्कर्ष है
—
यह न केवल लीला,
यह मोक्ष का स्वरूप है।
(हरिगीतिका
– राधा की अनुभूति)
तन थिर भयो, मन
हरि में विलस,
नयनन में ज्योति समुद्र
समाय।
शब्द मरे, स्वर मौन
भए,
बस हृदय ध्वनि हरि
नाम सुनाय।
(दोहा
– अद्वैत बोध)
अब न राधा, न
कान्हा —
केवल रस शेष, अनादि,
अनंत।
दृश्यांत
(समापन)
कृष्ण
और राधा एक-दूसरे
में विलीन।
जमुना का जल, कुंज
का वातावरण, ब्रज की वसुंधरा
—
सभी आनंद और प्रेम
से झिलमिलाते हैं।
प्रातः किरणें मानो उनके मिलन
को आशीर्वाद दे रही हों।
सभी गोपियाँ और ग्वालिनें शांतिपूर्वक
देख रही हैं।
तत्त्वार्थ
(दार्शनिक व्याख्या)
चेतन
प्रभात दर्शाता है ज्ञान और प्रेम का उदय।
रास और अंतर्मन संवाद
से राधा की चेतना
जागृत हुई।
अब भौतिक रूप, नाम, और
भेद मिट गए हैं।
केवल प्रेम और चेतन का
अद्वैत स्वरूप शेष है।
यह वही क्षण है
जहाँ जीवात्मा अपने ईश्वर में
पूर्ण रूप से विलीन
होती है।
रास
पंचाध्यायी – पंचम अध्याय : समर्पण रास (निष्कर्ष एवं मोक्ष) 🌟
(रीतिकालीन नाट्य-काव्य रूप — सवैया, हरिगीतिका, और दोहा मिश्रित)
संदर्भ
(भूमिका)
चेतन
प्रभात के बाद।
राधा और कृष्ण पूर्णतः
विलीन।
रास, रासारंभ और अंतर्मन संवाद
की अनुभूतियाँ अब मोक्ष रूप
ले रही हैं।
यह अंतिम अध्याय समर्पण और अद्वैत प्रेम का चरमोत्कर्ष दिखाता है।
सभी ब्रजवासी, गोपियाँ, ग्वाल और प्रकृति स्वयं
इस दिव्यता में सहभागी हैं।
संवाद
(सवैया और हरिगीतिका छंदों में)
(कृष्ण
– प्रेम का अंतिम स्वरूप)
देखो
राधे! अब न मैं,
न तू —
बस रस शेष, अनादि
अनंत।
यह समर्पण रास है,
जहाँ प्रेम ही परम योग,
और आत्मा-परमात्मा का बंधन अमर
रहंत॥
(राधा
– समाधिस्थ स्वर में)
हाँ
कान्ह! अब तन, मन,
नाम, रूप — सब विलीन।
केवल प्रेम शेष, केवल चेतन
बहे।
अब कोई भेद नहीं,
न दूरी, न भय,
केवल रस का महासागर,
अनंत विस्तार में रहे।
(सवैया
– कृष्ण और राधा का संवाद)
राधे!
यह रास न केवल
आनंद है, न केवल
लीला।
यह आत्मा का परमात्मा में
विलयन,
यह प्रेम की सर्वोच्च अवस्था,
जहाँ जगत के बंधन
मिट गए,
और केवल अद्वैत आनंद शेष है।
(हरिगीतिका
– गोपियाँ और वृंदावन का दृश्य)
यमुना
बहे मंद स्वर में,
वृंदावन महक्यो सुधा में।
बांसुरी गूंजे, दीप जले, और
कुंज झिलमिलाए।
राधा–श्याम एक रूप भए,
और जग प्रेम में
नहा।
यह रास समर्पण का
क्षण,
अनादि, अनंत, अमूल्य।
(दोहा
– मोक्ष का संदेश)
न मैं, न तू,
न रूप, न नाम,
केवल रस शेष, केवल
राम।
दृश्यांत
(समापन)
- राधा और कृष्ण एकाकार, संपूर्ण ब्रह्म रूप में विलीन।
- यमुना, कुंज, वृंदावन — सभी उनके विलय में झिलमिलाते हैं।
- सब जीव इस अद्वैत रस का अनुभूति करते हैं।
- समापन में बाँसुरी और चंद्रमा की छाया भी स्थिर, शांति और आनंद में समाहित।
तत्त्वार्थ
(दार्शनिक व्याख्या)
पंचम
अध्याय समर्पण रास का प्रतीक है
—
जहाँ राधा–कृष्ण का
विलय पूर्ण रूप से अद्वैत
में होता है।
यह अध्याय दिखाता है कि प्रेम,
नृत्य, संगीत, और लीला केवल
माध्यम हैं;
असली लक्ष्य — आत्मा का परमात्मा में विलय।
यह रास अनादि, अनंत
और अमूल्य है,
जो जीव और ब्रह्म
के मध्य अंतिम बंधन
को समाप्त करता है।
यही मोक्ष का भाव और
प्रेम का चरमोत्कर्ष है।
समग्र
निष्कर्ष
अब चारों पहले अध्याय (प्रातः,
रासारंभ, अंतर्मन संवाद, चेतन प्रभात) और
पंचम अध्याय (समर्पण रास) मिलकर बनाते
हैं —
“रास
पंचाध्यायी”
एक पूर्ण रीतिकालीन नाट्य-काव्य ग्रंथ,
जिसमें
- संदर्भ → छंदबद्ध संवाद → तत्त्वार्थ
की क्रमबद्धता है।
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